Saturday, 17 June 2017

केदारनाथ में आज भी दिखते हैं त्रासदी के निशान





घुमक्कड़ी, एक ऐसा शौक जो समय के साथ जूनून में बदल जाता है। मेरे लिए भी ये शौक जूनून में बदलता जा है। इसी शौक के साथ मैंने इस बार केदारनाथ जाने का फैसला किया। उत्तराखंड में मौजूद हिन्दू मान्यताओं में यह अंतिम जोतिर्लिंगों में आता है । कहते हैं यहाँ के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ जाने वाले लोगों का तो नहीं पता लेकिन मेरा खुद का अनुभव बहुत अनोखा है। देश -दुनिया की हर जगह घूमना एक तरफ और केदारनाथ का अनुभव एक तरफ। जिस तरह केदारनाथ जाना एक सपने जैसा है वैसे ही वंहा से वापिस आने के बाद भी अब वो सभी अनुभव फिर से सपने जैसा ही लगता है।

  घरवालों के लिए मेरा केदारनाथ जाने का यह निर्णय थोड़ा चौकानें वाला था। 2013 कि त्रासदी के बाद सिर्फ कल्पनाओं और मोबाइल की स्क्रीन पर ही बाबा केदार के दर्शन पाकर सभी खुश थे। ऐसे में वंहा जाने का फैसला घर के अन्य लोगों के लिए ज़रा मुश्किल था। लेकिन घुमक्कड़ी का यह शौक उन्हें भी है। बस फिर भोले शंकर का नाम लेकर हमने हरिद्वार का रिज़रर्वेशन करवा लिया। जंहा से गंगाजल भरकर बाबा केदार को चढाने का इरादा था। हरिद्वार से जल लेकर हमारा सफर एक प्राइवेट कार से शुरू हुआ।

 सुबह 9 बजे से गाड़ी की एक खिड़की से मेरी आँखे उस केदार पर्वत को देखने के लिए बेताब थीं। लेकिन 250 किलोमीटर का पहाड़ी सफर इतना आसान भी नहीं था। ऊबड़ खाबड़ रास्तों ने जंहा सब के पेट खराब कर रखे थे वंही चिलचिलाती धूप ने कार के एयर कंडीशनर को चिढाना शुरू कर दिया था। खैर हरिद्वार से ऋषिकेश और रुद्रप्रयाग से होता हुआ हमारा काफिला फाटा तक शाम 7 बजे तक पहुंचा।
सफर करने वाले लोग इस बात को अच्छे से समझते होंगे की अगर ड्राइवर अच्छा हो तो सफर का पता नहीं चलता। हमारे ड्राइवर बिट्टू भी कुछ ऐसा ही था। जिसने केदार नाथ के सफर की कुछ रोचक कहानियां घर वालों को सुनाई थीं। मेरा ध्यान बिट्टू की बातों पर उस समय गया जब उसने कहा वह 2013 में हुए हादसे का गवाह था। भले ही वो ऊपर पहाड़ की चोटी पर न रहा हो लेकिन उस समय हम जैसे ही यात्रियों को सोनप्रयाग पर छोड़ के वह उनका इंतजार कर रहा था। सोनप्रयाग वह जगह है जंहा बहुत से वेरिफिकेशन और जांच पड़ताल के बाद 5 किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक के लिए टैक्सी मिलती है। और फिर गौरीकुंड से शुरू होता है वो रोमांचक सफर जंहा के अनुभव को बताना असम्भव सा है।

मौसम बईमान है बड़ा
हरिद्वार की जला देने वाली गर्मी से निकालकर जब हम शाम 4 बजे तक रूद्र प्रयाग पहुंचे तो मौसम सुहावना हो गया था। गुलाबी शाम और तेज़ हवाओं ने सब के सेहत को फिर से यही कर दिया था। अलखनन्दा नदी के किनारे से आने वाली हवाएं सिहरन पैदा कर तो रही थी लेकिन गर्मी में बहुत देर तक सफर करने के कारण यह बहुत अच्छा भी एहसास करा रही थी। हम कुछ देर रुककर  जब फाटा की और वापिस बढे तो मौसम ने अचानक ही रंग बदल लिया। धुप जैसे कंही गायब हो गयी । सामने पहाड़ पर लगे पेड़ और दिखाई देने वाले जंगल का हरा रंग इतना गहराता गया मानों कुछ देर पहले ही बारिश ने सभी को भिगोया हो। बहार हवा इतनी ठंडी थी की  हमारी खिड़कियां अपने आप ही बंद हो गयी। शाम 7 बजे फाटा पहुँचते ही हमने सबसे पहले चाय पीना और स्वेटर पहनना ज़रूरी समझा। पहाड़ी इलाकों में 7 बजे के बाद कोई भी गाड़ी नहीं चलती इसलिए फाटा ही हमारा आखिरी स्टॉप रहा जंहा पे एक रात बिताकर हमे सुबह 4 बजे केदारनाथ के लिए निकलना था।
सुबह उठके जो नज़ारा आँखों के सामने था वो बेतरीन था। चारों तरफ पहाड़ से घिरा एक छोटा सा क़स्बा था फाटा। पहाड़ इतने करीब थे की मानों हाथ बढ़ाकर पकड़ा जा सके। दूर पहाड़ पर जमी बर्फ को बादलों के पीछे से देखा जा सकता था। ठण्ड तो इतनी थी की दो मोज़े के अंदर भी पैर बर्फ जैसा था। 


अपनी गाड़ी में बैठ कर हम सोनप्रयाग की ओर आगे बढे जंहा से हमे ब्रह्मकुंड के लिए जाना था और वंही से शुरू होनी थी बाबा केदार की यात्रा। जैसे - जैसे हम सोनप्रयाग की और ऊपर जा रहे थे सूरज भी अपनी किरणों से हमे राहत दे रहा था। बहुत से जांच और परिक्षण के बाद हम ब्रह्मकुंड पहुचं चुके थे। जंहा 15 हज़ार घोड़ों का एक दल पहले ही ऊपर की और निकल चुका था । और नीचे घोड़ों के लिए मारा मारी चल रही थी। हमने भी सात लोगों के लिए घोड़े कर लिए थे। लेकिन मुहँ माँगा पैसा देने के बाद भी हमे सिर्फ छः घोड़े ही मिल पाए थे।
खैर आखिरी फैसला यही हुआ की रास्ते में चलते हुए मेरे पापा और एक और रिश्तेदार एक- एक कर अलग- अलग समय पर घोड़ों पर बैठ जायेंगे। मेरे पापा को ना जाने क्या सूझी वो बोले में पैदल चलता हूं आप सबसे आगे मिलूंगा। इतना कह कर वह निकल गए। हम सबने घोड़े की सवारी पहले भी की थी लेकिन सीधे रास्तों पर, पहाड़ का ये रास्ता ऐसा था जैसे हम नीचे खड़े होकर अपने घर की छत को निहार रहे हो। एकदम सीधी चढ़ाई। और रास्ते कच्चे। अगर इन रास्तों पर हिम्मत करके चला भी जाये तो सामने दिखने वाले बोर्ड आपको डराने वाले होंगे जिनमें पहाड़ गिरने के अंदेशों को बार बार बताया जा रहा था। 

एक के पीछे एक लगे घोड़ों की लंबी कतारों में हम सब गाना गाते और अपने घोड़ों वालों से बतियाते ऊपर चढ़ रहे थे। सुबह 11 बजे से शुरू की हुई कि हुई वो चढ़ाई शाम 7 बजे ख़त्म होने वाली थी। अपनी बातों में हम इतने मशगूल थे या यूँ कहे रास्तों से ध्यान हताने के लिए ही शायद इतनी बाते कर रहे थे की किसी को भी पापा का ध्यान तक नहीं आया। 4 किलोमीटर चलकर हमारा काफिला 1 या 1:15 के करीब पहले पड़ाव पर रुका। घोड़ों की हालत तब तक सही लग रही थी जब तक एक घोड़े को ज़मीन पर पागलों की तरह तड़पते नहीं देखा। हमारे सामने ही एक घोड़ा आगे नहीं बढ़ रहा था। उसके मालिक ने पहले तो उसे रस्सी से खींचा फिर उसके पैर पर इतना मारा की वो घोड़ा ज़मींन पर गिर पड़ा। और विरोध में चिल्लाने लगा। 

वंही खड़े होकर हमारे घोड़े वाले ने कुछ बहुत धुंधली सी पहाड़ियों की और इशारा किया। वो पहाड़िया इतनी दूर और इतनी धुंधली थी की ठीक से दिखाई भी न दे रही थी। उन्होंने कहा कि अब अगला पड़ाव वही हैं। पड़ाव!! मतलब वंहा रुकना था? उससे भी आगे हमें कि चढ़ना था। बहुत देर चढ़ाई करने के बाद अब हम उस रास्ते पर थे जंहा एक और बर्फ का पहाड़ था और दूसरी और गहरी खायीं। ऐसे खायीं जिन्हें बादलों ने पूरी तरह ढक लिया था। बर्फ के पहाड़ ज़मींन से लगे हुए थे । जंहा अलग - अलग मुहँ और पोज़ बनाके लोग डीपी खिंचवा रहे थे। बर्फ के पानी से रास्ता इतना ख़राब हो चूका था कि कीचड़ से सने उन रास्तों में किसी का भी पैर फिसले तो वो खायीं और बादल की आगोश में जा गिरे। उसपर घोड़े पे चलना और भी खतरनाक था।
जिस वक्त हम अपने दूसरे पड़ाव तक पहुचें है सबके चेहरे ठण्ड से लाल हो चुके थे। हाथ इतने ठंडे थे की जलती हुई चाय को पकड़ने में गर्म नहीं बल्कि राहत महसूस हो रही थी। लेकिन ये राहत टिकती कहा हैं सब को अब ये बात खाये जा रही थी की नीचे से पैदल चले पापा अभी तक कंही मिले नहीं और अगर वो पीछे हैं तो अब कैसे आएंगे? सब ने अपने अपने मोबाइल से उन्हें फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन अब तक हम मोबाइल नेटवर्क के क्षेत्र से बहुत ऊपर थे। हमने चलने का सिलसिला फिर भी जारी रखा। खड़ी चढ़ाई चढ़ने और बहुत से कच्चे कीचड़ वाले रास्तों को पार करने के बाद हमे घोड़े वालों ने बादलों के बीच लाकर छोड़ दिया। हाँ वो था तो उनका आखिरी पड़ाव ही जंहा बाकी लोग भी थे लेकिन सिवाय धुंध के हमें कुछ नहीं दिख रहा था। सांस लेने में इतना भारीपन महसूस हो रहा था कि हमे कपूर की गोलियां सुंघनी पड़ रही थी। 

पैर आगे बढ़ने के साथ दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। पापा कंहा होंगे ? चढ़े होंगे भी या नहीं ?  जैसे सवाल ना चाहते हुए भी दिमाग को और सुन्न कर रहे थे। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए मैंने एहसास किया की अब हम उस जगह खड़े थे जंहा आज से 4 साल पहले आये सैलाब ने सब ख़त्म कर दिया। जंहा का वाकया सुनकर लोग आज भी काँप जाते हैं। दिमाग में जैसे अपने आप वो काल्पनिक दृश्य बन गया कि उस सामने वाली पहाड़ी से गिरा होगा पानी, उसी से फटकार सरोवर ने अपना अकाल रूप दिखाया होगा। रस्ते में पड़े मलबे , टूटे खंभे, टीन के कुछ टुकड़ों को देख के रूह कांप जाने वाले दृश्य ज़हन में उबरने लगे। -1 के परे पर ना तो चला जा रहा था न बैठा जा रहा था लेकिन मंदिर तक जाने के लिए अभी भी कुछ किलोमीटर पैदल चलना था।

और दिख गया वो अद्भुत नज़ारा
मैं जानती हूँ इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। पहली बार जब उस विशालकाय मंदिर को देखा तो ना जाने क्यों इतना रोई हूँ की आस पास के लोगों ने सहानुभुति देना शुरू कर दिया। विशाल पर्वतों से घिरे एक समतल ज़मींन के टुकड़े पर वो मंदिर मेरे सामने थी जिसे देश तो क्या विदेशों में भी रहस्यमयी मंदिरों में से एक मानते है। आस पास नज़र उठा कर देखा तो टूटे फूटे घर, घर से लटकता कम्बल, उलटी पड़ी पुरानी चप्पल, घर के कुछ सामान, टूटे टावर, टूटी दीवार सब जैसे हादसे का दर्दनाक सच बयां कर रहा था लेकिन केदारनाथ मंदिर की शोभा झालरों और स्पीकरों के साथ गेंदें की मालाओं पर सुशोभित थी।
शायद रोना इसलिए भी और आ रहा था कि मंदिर तक पंहुच आये मगर पापा का अभी तक कोई पता नहीं था। हल्के से उजाले में हमने मंदिर के बगल वाली पुलिस सहायता केंद्र में पापा के नाम की घोषणा भी करवा दी थी लेकिन उसके बाद भी न कोई खबर थी न उनका पता।
अँधेरा अपने चरम पर था रात के 8:30 बजे मंदिर के ठीक सामने वाले होटल की खिड़की खोले में मंदिर के मुख्य द्वार को देख रही थी। ऊपर न तो लाइट थी न इन्वर्टर जैसे सुविधा मोमबती में बैठे के हम सब बस पापा के सही सलामत Eआने का इंतज़ार कर रहे थे।

मिलने बिछड़ने का हो गया अद्भुत अनुभव
अँधेरे कमरे में मंदिर की ओर देख रहे हम सब का ध्यान अचानक टूट गया जब पापा ने दरवाज़ा खोला और अचेत से आकर बिस्तर पर गिर पड़े। खुद ले आसुंओं को रोककर जब हमने उनका हाल पूछा तो समझ आया वह लगातार रो रहे थे। उन्होंने कहा कि "मुझे लगा आज के बाद में तुम सबसे नहीं मिल पाउँगा।" उनका इतना कहना की पूरा माहौल जैसे आंसुओं में बदल गया। सब ने अपने आसुंओं के साथ उस चिंता और घबराहट को बहार निकाला जो बहुत देर से घर करके हमारे अंदर बैठी थी। मंदिर की घंटियों से पता चला की कपाट बंद होने का समय आ गया था।

और रात 3:30 बजे आया दर्शन का नंबर
पांच हज़ार की पर्चियां कटवाकर आप भी भोले बाबा को छु कर दर्शन पा सकते हैं। बस अन्तर यही होगा की उसमें आपको मंदिर के मुख्य द्वार से नहीं बल्कि पीछे के द्वार से अंदर ले जायेंगे। खैर धांधली तो हर जगह है। और बिना पैसे अब भगवान् के दर्शन भी संभव नहीं हैं। हमने भी दर्शन करके मंदिर के गर्भ गृह को छोड़ दिया। घी की मालिश हो या पांडवों की प्रतिमा पर ठण्ड से जमा घी। सभी दृश्य आँखों में कैद करने वाले थे। काले पत्थरों से बना मंदिर का गर्भ गृह पुराने समय की नक्काशियों को दिखाता है।
दर्शन करके जब हम बहार आये तो पारा - 3 तक पहुच चूका था। सुबह होने में अभी कुछ घंटे बचे थे जिसे हमने रज़ाई में बिताना ज़्यादा सही समझा।
सुबह 7 बजते ही हमने होटल से बहार देखा तो एक पल को धोखा हो गया। लगा मंदिर के पीछे नीलकंठ पर्वत पर किसी ने चांदी का वर्क किया हो। लेकिन उस विशालकाय पर्वत पर सूरज की पहली रौशनी पड़ते ही फिर से दिल खुशमिज़ाज़ हो गया। इतना रूमानी दृश्य और रुई से जैसे कोमल बर्फ की परते अपनी और आकर्षित करने लगी। ये सभी नज़ारा देख कर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि कभी इस खुबसूरत दृश्य ने एक भयानक रूप लिया होगा। हमारे होटल वाले ने पहाड़ के पीछे से आने वाले उस रास्ते को दिखाया जिससे सैलाब वाला पानी नीचे आया था। पहाड़ पर बने उस 30 से 40 फुट निशान को देख कर ही पानी के धार का अंदाज़ा लगाया जा सकता था।
बातों बातों में होटल के मालिक आनंद ने हमे बताया कि जिस होटल में हम रुके थे 2013 के पहले वह तीन मंजिला हुआ करता था। लेकिन उस भीषण सैलाब ने होटल की दो इमारतों को ज़मीन में धंसा दिया था। हमने जब बहार निकालकर देखा तो सच में हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन अंदर धँसी पड़ी थी। जिनमें सिर्फ कुछ फटे पुराने कपडे, कम्बल, और मलबे थे। सरकार चाहते हुए भी उसे साफ़ नहीं करवा प् रही है। 6 महीने कपाट खुलने से भीड़ इतनी हो जाती है कि उनके इंतज़ाम में समय चला जाता है। और बाकी के 6 महीनों में मौसम का हाल खुद ही समझा जा सकता है।

हेलीकाप्टर और मेडिकल की है सुविधा
वैसे तो पैदल चढ़ना ही यात्रा का असली मतलब होता है लेकिन सरकार ने यात्रियों की सुविधाओं के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा चला दी है। ऑनलाइन बुकिंग करवाकर आप दिन भर की चढ़ाई को सिर्फ 20 मिनट में पूरी कर सकते है। इसके साथ ही रास्ते में चलते वक़्त या मंदिर के पास भी मेडिकल कैम्पों की अच्छी व्यवस्था है जिसका उपयोग किया जा सकता है।