Tuesday, 31 December 2013

.........अजी ये पब्लिक है जी.......


                                    ये पब्लिक है ये सब जानती है....पब्लिक है....जी हाँ जनाब ये पब्लिक है और ये सुब कुछ जानती है| बात चाहे घर चलने कि हो या देश चलाने कि इस पब्लिक को पता है कि कौन सा कदम कब उठाना है| ये पब्लिक ही है जो एक इन्सान को ज़ीरो से हीरो बनाती है और अगर चाहे तो उसे हीरो से वापिस ज़ीरो बना देती है| किसी नेता या अभिनेता को ये जितनी तेज़ फलक पे उठाती है उतनी ही तेज़ फर्श पर लाकर पटक देती है| ऐसे ही अर्श से फ़र्श तक का सफ़र तय किया है भारत के एक आम नागरिक ने| ये कहना गलत नहीं होगा कि इस भारत कि जनता ने ही उसके इस सफ़र को पूरा करवाया है| आज वो “आम” नागरिक भारत कि उस राज  गद्दी पर जा बैठा है जिस पद को पाने कि उम्मीद तमाम पोलिटिकल पार्टीज़ में आज भी है और अब तो उस उम्मीद पर पानी भी फिर चुका है| दिल्ली के सिंघासन पे बैठा आज एक “आम” आदमी, जिसे इसी जनता ने रामलीला मैदान के उस अनशन से उठा के शपथ ग्रहण समारोह में बैठा दिया है| वही आदमी आज देश से और देश के वासियों से उन तमाम वायदों को पूरा करने का दावा कर रहा है जिसके बल बूते ही शायद वह दिल्ली कि राजगद्दी पर जा बैठा है| पानी मुफ्त, बिजली कि कीमतों में गिरावट, महंगाई कम, झुग्गी झोपड़ी कि जगह पक्के मकान, भ्रस्टाचार ख़त्म.....माना आज हमारा देश इन सारी स्मस्स्याओं से जूझ रहा है मगर क्या आज तक किसी भी नेता ने उन झुग्गी झोपड़ी में रहने वालो से ये पूछा है कि क्या उन्हें जिंदा रहने के लिए रोटी कि ज्यदा ज़रूरत है या मकान कि?? क्या उनकी झुग्गियों में बिजली है? कही ऐसा तो नहीं कि किसी दिन पेट भर खाना न मिले तो उन्हें पानी पी के ही रात बितानी पड़ती है?

                                                            नहीं शायद आज तक ऐसा नेता नहीं आया है जो उन लोगो के बारे में सोचे जो चुनावों के समय में लम्बी-लम्बी कतारों में बड़ी सहजता से खड़े होकर अपना नेता चुनते है| शायद यही कारन है कि ये पब्लिक सिर्फ झालावे में आ जाती है और ये सोचके कि अगला नेता उनके लिए कुछ अच्छा करेगा वो अपना सब कुछ एक वोट के ज़रिये नेता जी को दे देती है| ठीक ऐसा ही हुआ है इस बार भी| इस बार भी एक आम आदमी जिसने पब्लिक कि तकलीफों को समझा उसे देखा और ये बीड़ा उठाया कि देश के लोगो को, देश कि समस्सया को वो जड़ से उखाड़ के बाहर फेंकेगा| हम मानते है कि वह दिल्ली का राजा एक आम आदमी है, वो भी हम आम लोगो से निकलकर ही उस लालकिले तक पंहुचा है मगर शायद उसे इस बत का अंदाज़ा नहीं कि अगर उसने जनता से किया वादा पूरा नहीं किया तो सिर्फ एक चुनावी बटन उनकी ज़िन्दगी तबाह कर देगा और अपने इसी ताकत से ये पब्लिक फिर किसी नए शख्स को लाकर खड़ा कर देगी|  

                         इस आम आदमी से अनुरोध है कि वो जनता को बेवकूफ सझने कि बेवकूफी न करे और अपने वायदों को पूरा करके देश कि समस्याओ को कम करें| क्योकि अगर ये आम आदमी और उनकी पार्टी पब्लिक कि नज़रों में और दिल में जगह नहीं बना पाई तो ये पब्लिक उसे नज़रों से उतरकर फर्श पे गिरा देग| क्योंकि भईया ये पब्लिक है ये सब जानती है.....पब्लिक है........

Sunday, 29 December 2013

बचपन कि यादें.........


 
                                              चंपक,बालहंस,पराग,चाचा चौधरी,नागराज,पिंकी.......याद आया कुछ!!!!!??? जी हाँ हमारे समय कि कुछ ऐसी कौमिक्स जिसके लिए हमारे बीच होड़ सी मची रहती थी| छुट्टियों में दिन भर खेलने के बाद सिर्फ इनको पढना ही हमारा कम हुआ करता था| हम अपनी साडी जमापूंजी इन कौमिक्स में ऐसे उड़ाया करते थे कि बस पूछों ही मत.....मम्मी कि वो डांट,पापा कि फटकार क्या-क्या नहीं झेला था सिर्फ उस एक कौमिक्स के लिए| चाचा चौधरी तो शायद हमारी जान हुआ करते थे,उनकी सूझ-बूझ और होशियारों को पढकरही हम आज शायद इतने अक्क्ल्मंद हुए है| बालहंस कि वो सभी जानकारियां,आज भी ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर हमारा साथ देती है| चंपक की वो सभी कहनियाँ और किस्से आज भी दिमाग में चिपके हुए है,तभी तो आज भी हम अपनी बात सिद्ध करने के लिए उन्ही कहानियों और किस्सों का उदहारण लेते है|

                                  हर साल दिवाली से पहले जब घर का सारा कबाड़, कबाड़ वाला ले जाता था तो हम अपनी इन कौमिक्स को किसी आलमारी या कपडें से ढककर छुपा देते थे कि कहीं इन्हें भी रद्दी समझकर कबाड़ में न डाल दिया जाये| गलियों में,दोस्तों के घरों में,सिर्फ एक बात पर ही चर्चा होती थी कि किसने कोण सी नयी कौमिक्स पढ़ी??? फिर उस नयी कौमिक्स को आपस में बाँटने में भी झगड़ें होते थे| ओहो ये कौमिक्स कि दीवानगी आज के समय में तो ये कंही गम सी हो गयी है....आज कल  न तो इन्हें जल्दी कोई खरीदता है और न ही पड़नेवाले वाले ही ज्यादा बचे है|आज कल बच्चों के कन्धों पर कोम्पटीशन इतना ज्यादा दल दिया गया है कि उन्हें अपने 5-8किलो के किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती| जो थोड़ी भुत कसर बचती है तो उसमे कुछ तो hoby class में और कुछ computer games में निकल जाती है| घरों में डिसकशन, computer games पे होता है|इस कोम्पटीशन कि दुनिया में अपने बच्चों को आगे, बहुत आगे निकलने कि कोशिश में माँ-बाप ने बच्चों को उस सच्चाई से रूबरू नहीं कराया है जो देखने में तो सिर्फ मनोरंजन जैसी ही है लेकिन असल ज़िन्दगी में इसके फायदे शायद बड़े होने पर ही समझ आते है|