Friday, 27 May 2016

कंपनी बाग की दीवारों पर सेल्फी लेने की होड़



जिस कंपनी बाग की दीवार पर सिर्फ पान की पीक और कचड़े का ढेर दिखाई देता था, वहां आज सेल्फी लेने की होड़ सी मची है। आजाद पार्क  की दीवार पर बनीं रंग-बिरंगी आकृतियों के साथ युवा सेल्फी लेने के लिए उतावले नजर आते हैं।
शहर को स्मार्ट बनाने में जितना काम सरकार कर रही है उतना ही काम शहर के युवा भी कर रहे हैं। तेजी से बनते हुए आजाद पार्क की दीवारों पर जल्द ही देश की इतिहास को बताती हुई कलाकृतियां दिखाई देंगी। कंपनी बाग की दीवार पर वॉल पेंटिंग का काम शुरू किया गया है। जिसका उद्देश्य आजाद पार्क को सुन्दर बनाने के साथ लोगों को देश की वर्तमान स्थिति दिखाना है। अप्रैल के तीसरे हफ्ते से शुरू हुए इस वॉल पेंटिंग में कंपनी बाग का एक हिस्सा सजाया जा रहा है।

बीएफए डिपार्टमेन्ट के सात बच्चों ने किया है पहल
कंपनी बाग के सौंदर्यीकरण के लिए बनाई जा रही वॉल पेंटिंग इविवि के छात्र बना रहे हैं। बीएफए और एमफए कर रहे सात छात्रों का समूह शाम चार बजे से रात दस बजे तक दीवारों पर पेंटिंग और स्केचिंग करता है। शहर के लल्ला चुंगी चौराहे और निराला सभागार की दीवारों पर बनीं पेंटिंग भी छात्रों के इसी समूह ने बनाई हैं।

पेंटिंग से दे रहे हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश
बीएफए के पुराछात्र और समूह के लीडर अमरेन्दु सिंह ने बताया कि दीवारों पर बनाई जा रही पेंटिंग्स का अपना अलग-अलग महत्व है। ट्रेडिशनल चीजों और प्रचीन इतिहास को देश की वर्तमान स्थिति से जोड़ते हुए रंगों के माध्यम से दिखाने की कोशिश की जा रही है।

दीवार पर नीले, पीले और सफेद रंग से बनी पेंटिंग में खोखले पेड़ों के अन्दर सिर्फ ऊंची-ऊंची इमारतें दिखाई गई हैं। इन खोखले तनों और इमारतों के बीच विलुप्त होते हुए जानवरों को बचाने का संदेश दिया गया है।

Thursday, 21 April 2016

और एक बार फिर पृथ्वी को हरा-भरा रखने का लेंगें संकल्प

पर्यावरण को नहीं बचाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इंन्सानी जिंदगी को बचाने और बनाने का एक मात्र उपाय है पर्यावरण को बचाना। इसके लिए हमें जी जान से कोशिश करनी होगी। ऐसे भाषण अक्सर संगोष्ठियों और नेता, अभिनेताओं के मुंह से सुनने को मिलते हैं। पर्यावरण को बचाने और संवारने के लिए सरकार के द्वारा भी बहुत से निर्देश दिए गए हैं। जहां तक बात करें शहर की तो जल्द ही शहर स्मार्ट होने की कगार पर है। चमचमाती सड़कें, पर्यटन स्थल और पार्किंग स्लोट। इस स्मार्ट होते शहर में कहीं ना कहीं हम पर्यावरण को धोखा दे रहे हैं।

दिन-रात हो रही कड़ी मेहनत से शहर को नया लुक देने की कोशिश की जा रही है। गाड़ियों और साइकिलों के लिए अलग-अलग रास्ते बनाएं जा रहे हैं। पर्यावरण की दृष्टि से इन सड़कों के बीच हजारों नए पौधे भी लगाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि 45 डिग्री तापमान में जहां इन्सान सूखे जा रहे हैं वहां यह सभी पौधे बड़े ही आसानी से जिंदा बचे रह सकते हैं। अपनी जिंदगी की शुरूआत कर रहे आठ इंच के इन पौधों को जहां शहर की सुन्दरता के लिए लगाया जा रहा है वहीं बगल में लगे 35 फुट बड़े और लगभग दस साल पुराने पेड़ को बेरहमी से काट भी दिया गया है।
शासन-प्रशासन से सहमति लेकर भले ही इस पेड़ को काटा गया हो लेकिन शहर के लोगों और चौराहे पर खड़ी ट्रेफिक पुलिस को छांव देने वाले इस पेड़ को भी शहर के सौन्दर्यीकरण होने का शिकार होना पड़ा है। जहां पेड़ों का समूह अपने साथी के कटने का दुख मनाएगा वहीं पृथ्वी दिवस पर एक बार फिर इंसान पेड़ को कटने से बचने और पर्यावरण बचाने का संकल्प लेंगें।

Saturday, 16 April 2016

आलसी के साथ विरोधियों का शहर भी घोषित होना चाहिए इलाहाबाद

सात बजे के अलार्म और सुबह की एक कप चाय। दही-जलेबी के साथ अंगाड़ाई और भर पेट पराठे के साथ सुबह का नश्ता। खाने के शौकीन इस शहर को हमेशा से ही आलसी शहर का टैग मिलता रहा है। कभी काम के मामले में तो कभी घूमने के मामले में। प्रयाग के वासी हमेशा से ही एक ढर्रे पर चलने के आदि हो चुके हैं।
सुबह सात बजे उठकर मौज से नाश्ता, छह घंटे ऑफिस के बाद घर और फिर रात नौ बजे तक बिस्तर। ऐसे में शहर में हो रही कई नई और अच्छी चीजों की शुरूआत को भी हम अपने रवैये से खराब होने का दर्जा दे डालते हैं। जिसे गहराई से सोचकर देखें तो शहर आलसी होने के साथ एक विरोधाभास प्रकृति का भी होता जा रहा है।
शहर के सुन्दरीकरण के लिए शहर में जगह-जगह नए काम हो रहे हैं। जहां बजट में तीन फ्लाईओवरों की सौगात मिली है तो वहीं शहरों के पर्यटन स्थलों और पार्कों को सुंदर बनाया जा रहा है। इन सभी के बीच आजाद पार्क में लगने वाले टिकट शुल्क को लेकर शहर में सबसे ज्यादा गहमा-गहमी है। टिकट की प्रक्रिया वापिस लो और टिकट नहीं लगना चाहिए के साथ आजाद को बांध दिया जा


एगा जैसे वाक्यों के साथ शहर का एक हिस्सा आवाज उठा रहा है। सोचने वाली बात यह है कि बड़े होटलों में खाना खाने के बाद पांच रुपये टिप्स देना हो या गंगा-यमुना पुल क्रॉस करते समय नदी में मन्नत मांगते हुए पैसे फेंकना हो। इन सभी चीजों में शहर का एक भी सदस्य आवाज नहीं उठाता लेकिन शहर की सफाई और पार्कों को सुन्दर बनाएं अथवा उसके मेनटेनेन्स के लिए लिए जाने वाले शुल्क पर सबको नामंजूरगी है।
कभी धरना तो कभी बैठक शुल्क हटाने के लिए शहर के लोगों ने अजीबो-गरीब तरीके की दलीलें देने भी शुरू किए हैं। इन सभी घटनाओं को देखकर प्रयाग सिर्फ आलसी ही नहीं बल्कि विरोधियों का शहर भी समझ में आने लगा है।