कुछ लोग इसे
संस्कारों और सभ्यताओं का शहर भी कहते है| लेकिन पिछले कुछ सालों में इसने अपने आप
को आधुनिकीकरण की थाली में परोसा है| जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ संगम नगरी प्रयाग की| वैसे तो ये शहर अपने प्राचीन
इतिहास और तीन नदियों के संगम के लिए जाना जाता है मगर 2014 तक आते-आते इसने अपनी
पहचान सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनिया में बना ली है|
प्रयाग उर्फ़ इलाहाबाद में हर
साल लगभग लाखों की संख्या में विदेशी पर्यटक अपनी छुट्टिया मानाने आते है| लोग
चाहे देशी यात्राओं पे निकले हो या विदेशी यात्रा पर, अपने स्वाद के अनुसार खाने
की तलाश ज़रूर करते है| आप चाहे जन्हा जाये आपके साथ आपकी भूख भी पर्यटन पर निकल
पड़ती है| समस्या सिर्फ भूख की नहीं है, जीभ और उस के संस्कारों की है| स्थान बदलने
से जीभ की आदत नहीं बदलती| भूख को शांत करने के साथ-साथ जीभ का संतोष भी बहुत
ज़रूरी है|
आज से कुछ साल पहले जब देशी और विदेशी सैलानी इलाहाबाद को अपना नेक्स्ट डेस्टिनेशन बनाया करते थे तो उन्हें इस बात पर भी खासा ध्यान देना पड़ता था की “प्रयाग में जाकर हम अपने अनुसार भोजन कंहा और कैसे मिलेगा?” मगर वर्तमान समय में देश और दुनिया की ऐसी एक भी जगह नहीं बची जंहा का खाना इलाहबाद में नहीं मिलता| सिर्फ वेजिटेरियन ही नहीं बल्कि यंहा आने वाले सैलानी मटन, चिकन, और फ़िश फ्राई का भी भरपूर लुत्फ़ उठा सकते है|
इलाहाबाद न सिर्फ अपने इतिहास और महान नेता राजनेताओं के लिए जाना जाता है बल्कि यंहा के पकवानों को देशी और विदेशी दोनों ही अपने साथ डिब्बों में बांधकर ले जाना चाहते है| सुलाकी की मिठाई हो या जगराम का लड्डू, सुनील की चाट हो या देहाती का रसगुल्ला, इन सभी का नाम सुनकर ही मुंह में पानी आजाता है| शायद यही कारण है की इलाहाबाद वासी और इलाहाबाद आने वाला हर पर्यटक यंहा आकर इस शहर के साथ चाशनी सा घुल मिल जाता है| सिर्फ मिठाइयाँ ही नहीं प्रयाग और भी बहुत सी लज़ीज़ और स्वादिष्ठ पकवानों के लिए मशहूर है| नेतराम की कचौड़ी हो या हरी का दमालू, अग्रवाल की नमकीन हो या खोखा राय का दही-बड़ा, यंहा हर व्यंजनों को थोड़ा प्यार और बहुत सारे अपने पन के साथ परोसा जाता है| सिर्फ बड़े-बड़े होटलों में ही नहीं यंहा सड़क के किनारे लगने वाले ठेलें हो या चौराहों पर खोंचा में चुरमुरा बेचने वाले यंहा के स्वाद में जितनी विभिन्त्ता है उतना ही यंहा के लोगो में अपना पन| इलाहाबाद की सड़कों पे ही आपको वो स्वाद मिल जायेगा जो तमाम बड़े होटलों में मेज कुर्सी पे बैठे लोगो के बीच नहीं मिल पाता| प्रयाग यूँ तो तमाम जायकों के लिए मशहूर है मगर इन सभी चीजों में एक ऐसा व्यंजन भी है जिसे पूरे नार्थ-ईस्ट में बड़े ही चाव से खाया जाता है, और वो है अरहर की दाल और रोटी| इलाहबाद के 95% घरों में लगभग रोज़ दिन के खाने के लिए इसे ही चुना जाता है| हींग और देशी घी से छौंक मारके अरहर की दल को जब रोटी और मेथी वाली आलू की भुजिया क साथ परोसा गया हो तो बड़े-से बड़ा व्रत धरी भी अपने आप को खाने से रोक नहीं सकता| शायद इसी भोजन से इलाहाबाद के लोगो पर “सादा जीवन उच्च विचार” वाला नारा एकदम सटीक बैठता है|
सादे भोजन के अलावा इलाहबाद में साउथ इंडियन,
राज्य्स्थानी, गुजरती,बंगाली, फ्रेंच,चाइनीज़,इटैलियन,हर तरह का स्वाद मिलेगा|







