Monday, 20 October 2014

देसी धरती पर जायकों का तड़का.....


                               



                                 कुछ लोग इसे संस्कारों और सभ्यताओं का शहर भी कहते है| लेकिन पिछले कुछ सालों में इसने अपने आप को आधुनिकीकरण की थाली में परोसा है| जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ संगम  नगरी प्रयाग की| वैसे तो ये शहर अपने प्राचीन इतिहास और तीन नदियों के संगम के लिए जाना जाता है मगर 2014 तक आते-आते इसने अपनी पहचान सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनिया में बना ली है|
                  प्रयाग उर्फ़ इलाहाबाद में हर साल लगभग लाखों की संख्या में विदेशी पर्यटक अपनी छुट्टिया मानाने आते है| लोग चाहे देशी यात्राओं पे निकले हो या विदेशी यात्रा पर, अपने स्वाद के अनुसार खाने की तलाश ज़रूर करते है| आप चाहे जन्हा जाये आपके साथ आपकी भूख भी पर्यटन पर निकल पड़ती है| समस्या सिर्फ भूख की नहीं है, जीभ और उस के संस्कारों की है| स्थान बदलने से जीभ की आदत नहीं बदलती| भूख को शांत करने के साथ-साथ जीभ का संतोष भी बहुत ज़रूरी है|

                                       
आज से कुछ साल पहले जब देशी और विदेशी सैलानी इलाहाबाद को अपना नेक्स्ट डेस्टिनेशन बनाया करते थे तो उन्हें इस बात पर भी खासा ध्यान देना पड़ता था की “प्रयाग में जाकर हम अपने अनुसार भोजन कंहा और कैसे मिलेगा?” मगर वर्तमान समय में देश और दुनिया की ऐसी एक भी जगह नहीं बची जंहा का खाना इलाहबाद में नहीं मिलता| सिर्फ वेजिटेरियन ही नहीं बल्कि यंहा आने वाले सैलानी मटन, चिकन, और फ़िश फ्राई का भी भरपूर लुत्फ़ उठा सकते है|
 
                                                                                                                       
 इलाहाबाद न सिर्फ अपने इतिहास और महान नेता राजनेताओं के लिए जाना जाता है बल्कि यंहा के पकवानों को देशी और विदेशी दोनों ही अपने साथ डिब्बों में बांधकर ले जाना चाहते है| सुलाकी की मिठाई हो या जगराम का लड्डू, सुनील की चाट हो या देहाती का रसगुल्ला, इन सभी का नाम सुनकर ही मुंह में पानी आजाता है| शायद यही कारण है की इलाहाबाद वासी और इलाहाबाद आने वाला हर पर्यटक यंहा आकर इस शहर के साथ चाशनी सा घुल मिल जाता है| सिर्फ मिठाइयाँ ही नहीं प्रयाग और भी बहुत सी लज़ीज़ और स्वादिष्ठ पकवानों के लिए मशहूर है| नेतराम की कचौड़ी हो या हरी का दमालू, अग्रवाल की नमकीन हो या खोखा राय का दही-बड़ा, यंहा हर व्यंजनों को थोड़ा प्यार और बहुत सारे अपने पन के साथ परोसा जाता है|
सिर्फ बड़े-बड़े होटलों में ही नहीं यंहा सड़क के किनारे लगने वाले ठेलें हो या चौराहों पर खोंचा में चुरमुरा बेचने वाले यंहा के स्वाद में जितनी विभिन्त्ता है उतना ही यंहा के लोगो में अपना पन| इलाहाबाद की सड़कों पे ही आपको वो स्वाद मिल जायेगा जो तमाम बड़े होटलों में मेज कुर्सी पे बैठे लोगो के बीच नहीं मिल पाता| प्रयाग यूँ तो तमाम जायकों के लिए मशहूर है मगर इन सभी चीजों में एक ऐसा व्यंजन भी है जिसे पूरे नार्थ-ईस्ट में बड़े ही चाव से खाया जाता है, और वो है अरहर की दाल और रोटी| इलाहबाद के 95% घरों में लगभग रोज़ दिन के खाने के लिए इसे ही चुना जाता है|
हींग और देशी घी से छौंक मारके अरहर की दल को जब रोटी और मेथी वाली आलू की भुजिया क साथ परोसा गया हो तो बड़े-से बड़ा व्रत धरी भी अपने आप को खाने से रोक नहीं सकता| शायद इसी भोजन से इलाहाबाद के लोगो पर “सादा जीवन उच्च विचार” वाला नारा एकदम सटीक बैठता है|

                                   सादे भोजन के अलावा इलाहबाद में साउथ इंडियन, राज्य्स्थानी, गुजरती,बंगाली, फ्रेंच,चाइनीज़,इटैलियन,हर तरह का स्वाद मिलेगा|

Tuesday, 14 October 2014

मुन्नार: बादलों का शहर

                              ज़रा सोचिये, आप अपने पार्टनर के साथ कमरे में बैठे हो और बादलों का एक झुंड आपके कमरे आ जाये, सोचिये आप अपने कमरे की बालकनी में खड़े हो और आप के चरों तरफ नीले पहाड़ हो, आपके ठीक सामने पहाड़ो के ही बीच बादलों की सफ़ेद झील हो| ये खुबसुरत नज़ारा आपको ज़मीन से 90 किलोमीटर ऊपर “मुन्नार” में देखने को मिलेगा| कोयम्बटूर से शुरू होने वाला ये रास्ता आपको पहाड़ की उस उचाई तक ले जायेगा जंहा से बादल भी आपके नीचे हो जायेगा|
                                        केरला में ज़मीन से 90 किलोमीटर स्थित ये छोटा सा हिल स्टेशन “मिनी शिमला” के नाम से भी जाना जाता है| कोयम्बटूर स्टेशन से आप अपनी पर्सनल गाड़ी करके भी मुन्नार पहुच सकते है| वैसे तो ये हिल स्टेशन खुद में ही इतना खुबसुरत है की उसके सामने कुछ भी नहीं मगर इसके रस्ते में पड़ने वाले कुछ स्पॉट आपको यंहा दुबारा आने पर मजबूर कर देंगे|

                                     यंहा के रास्तों में पड़ने वाले झरने की गति और वेग इतना तेज़ होता है की आप इसे लगातार देख नहीं सकते| झरने का पानी दूध जैसा सफ़ेद होता है| ये झरने आपके इतने करीब होते है की अगर आप चाहे तो इसमें एक quick bath भी ले सकते है| सड़क के किनारे ही बने छोटे-छोटे रेस्तरां, नारियल और पाइनएप्पल की  दुकाने इस जगह में चार चाँद लगा देती है|  मुन्नार के रस्ते में दूर-दूर तक फैले पहाड़ों पर चाय की पत्तियों ने पूरे पहाड़ को ढक रखा है| दूर से देखने पर ऐसा लगता है मनो पुरे पहाड़ों ने हरे रंग की चादर ओढ़ रखी हो| यंहा के गोल-गोल रास्तों की ये हरियाली काफी फिल्मों में भी दर्शाई जा चुकी है|

          सोचिये, की आप अपनी गाड़ी में बैठे हो और आप के ठीक सामने बादलों का एक झुण्ड दिखाई दे, फिर आपकी गाड़ी अचानक से उन्ही बादलों के बीच से होता हुआ गुज़रे| कार की खिड़की से आप हाथ निकलकर उन बादलों को अपनी मुट्ठी में भर ले| यकीनन आपको ये किसी फिल्म का दृश्य लग रहा होगा मगर यकीं मानिये अगर आप मुन्नार के रस्ते में है तो आप “बादलों को अपनी मुट्ठी में भर सकते है|” मुन्नार के इन्ही रास्तों मे आप हाथी की सवारी का भी आनन्द उठा सकते है| यंहा के हाथी भी मलयालम भाषा समझते है| आपने दुनिया में अजीबो-गरीब तरह के मसाज़ सुने होंगे उन्ही में से एक मसाज़ मुन्नार के इन रास्तों पर किया जाता है| इस मसाज़ में आपका पैर एक बड़े से शीशे के जार में डाल देते है जो लगभग पानी से पूरा भरा हुआ होता है| इसके बाद उसी जार में 300-400 छोटी-छोटी मछलियाँ डाल दी जाती है| वो मछलियाँ बार-बार आपके पैरों को छूकर गुज़रती है| वंहा के लोग बताते है की इस मसाज़ से आपके हाथ और पैरों को काफी आराम पहुंचता है और आप एकदम रिलैक्स हो जाते है|
                      केरल के मसाले पूरे विश्वभर में जाने जाते है| खाना कैसा भी हो इटेलियन, जैप्निज़, या इंडियन हर खाने की जान होता है मसाला| केरल के मसाले ऑल ओवर वर्ल्ड सप्लाई किये जाते है| इन मसलों के सबसे ज्यादा गार्डन मुन्नार में ही पाए जाते है| मुन्नार में सिर्फ रास्तों पे ही इतनी सारी दार्शनिक चीज़े है की आप यंहा एक बार ज़रूर आना चाहेंगे| इसी के अलावा मुन्नार में कुछ और भी स्पॉट है जो बेहद खुबसुरत और अतुल्य है:


    The Echo Point: 
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                              अगर आपको अपनी आवाज़ बिना रिकोर्डिंग के नैचुरल तरीके से सुननी है तो मुन्नार स्थित ये Eco Point आपको ये मौका देता है| यंहा आप एक बार ज़रा ऊँचा बोलिए और आवाज़ गूंज कर वापिस आपके कानों में सुनाई देती है| सबसे ज़रूरी बात यंहा की ये है की ऐसा नज़ारा शायद आपको भारत के किसी भी और कोने में नहीं देखने को मिलेगा| ये Eco Point एक झील और जंगलों को मिलाकर बना है तथा इस झील के पानी का रंग एक दम हरा है| झील के हरे रंग का सच क्या है ये तो किसी को नहीं पता लेकिन यंहा के वाशिंदों से बात करने पर पता चलता है की झील काफी गहरी और खतरनाक जानवरों से भरी है|


 See Point:


            आमतौर पर अन्य जितने भी सी पॉइंट होते है वंहा टूरिस्टों और दुकानदारों का काफी शोर होता है| लेकिन मुन्नार में बना ये पॉइंट शोर-शराबे और प्रदुषण से दूर है| छोटी सी झील ले किनारे बैठ कर आप अपने ठीक सामने वाले पहाड़ों पर असंख्य हरियाली देख सकते है| झील के शांत पानी और आस पास के साफ माहौल को देखकर आप की थकन और चिन्ता सब ख़त्म हों जएगी| अगर आप अपने पार्टनर के साथ और टाइम बिताना चाहते है तो इस झील में चलने वाली स्टीमर पर बैठकर आप खुद स्टीमर चला सकते है|  

Saturday, 9 August 2014

यंहा के वातावरण में है शांति........
                                    भारत अपनी संस्कृती, तहज़ीब, एकता और वास्तुकलाओं के लिए जाने जाना वाला देश है| यंहा की हर प्राचीन इमारतों का इतिहास अपने में अनूठा है| सिर्फ प्राचीन ही नहीं भारत देश में कुछ ऐसी इमारते भी है जो कुछ दशकों पहले ही बनी है लेकिन उनपर की गयी कारीगरी आज भी चर्चा का विषय है| इन्ही में से एक है हैदराबाद में बना “बिरला मंदिर”|

                          1976 में बना ये मंदिर द्रेवेदियन, राज्य्स्थानी, और उत्कल तीन वास्तुकलाओं का अदभुत संगम है| मंदिर की इमारतों में इन तीनो कलाओं की झलकियाँ साफ देखी जा सकती है|  10 सालों में तैयार इस इमारत के निर्माण में लगभग दो हज़ार टन सफ़ेद मार्बल का इस्तेमाल किया गया है| हैदराबाद की नेकलेस रोड पे स्थित ये मंदिर ज़मीन से लगभग 280 फीट उपर पर स्थित है| मंदिर की बनावट का काम बिरला ग्रुप ने पूरा किया तथा इसी के नाम पर इस मंदिर का नाम बिरला मंदिर पड़ा|

                मंदिर की शुरुआत एक संकरी गली से होती है| जिसके दोनों तरफ फूल मालाओं से लेकर खाने की हर चीज़ अच्छे व सस्ते दामों में मिलती है| मंदिर का शुरुआती दरवाज़ा काफी बड़ा और सफ़ेद रंग के चमक से आने वाले श्रधालुओ का दिल से स्वागत करता है | मंदिर का दरवाज़ा हो या गुम्बद, सीढियाँ हो या दीवारे, सफ़ेद संगमरमर की चमक से पूरा मंदिर परिसर जगमगा उठता है| बिरला मंदिर की कलाकृतियों में  सबसे आकर्षित है यंहा बनी “प्रभु वेंकटेश्वर” की प्रतिमा | काले संगमरमर से बनी इस मूर्ति की उचाई ग्यारह फुट है तथा इसी प्रतिमा के ठीक उपर बना छतरीनुमा कमल यहाँ आने वालों को और भी प्रभवित करता है| सिर्फ यही नहीं इस मंदिर में शिव, गणेश, हनुमान, लक्ष्मी, सरस्वती,और साईं बाबा की प्रतिमाये भी बनायीं गयी है| बिरला मंदिर का एक और कोना यंहा के अकर्ष्ण का केंद्र है जो यंहा आने वाले श्रध्लुओ को अपनी और खींचता है, और वो यंहा की सबसे ऊँची इमारत पे बनी छत|


                    यंहा की ऊंचाई पे खड़े होकर पूरे हैदराबाद शहर को आसानी से देखा जा सकता है| बिरला मंदिर ही एक मात्र ऐसी मंदिर है जो “मंदिर” होने के बावजूद यंहा एक भी घंटियाँ नहीं है| बिरला मंदिर का निर्माण सिर्फ ध्यान लगाने के लिए किया गया है| शायद एक यही कारण है की यंहा का माहौल एक दम शांत और स्वच्छ है| यंहा के वातावरण में इतनी शांति और हरियाली है की यंहा आकर मन और दिमाग एकांत में प्रफ्फुल हो जाता है | 

Saturday, 2 August 2014

   अब अपनी  
चिंताओं को कहिये अलविदा........


                                        कहते है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है मगर यदि स्वस्थ मस्तिष्क ही न हो तो स्वस्थ शरीर का क्या फायदा?? इसी स्वस्थ शरीर को पाने के लिए ये बेहद आवश्यक है की अपने दिल और मन को शांत रखे | यूँ तो हर एक व्यक्ति के लिए सुकून ढूंढने का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, किसी को घर छोड़ ऑफिस में सुकून मिलता है तो किसी को घर में, कोई दोस्तों के साथ सारे दुःख भूल जाता है तो कोई परिवार के साथ | दुनिया में कुछ लोग तो ऐसे भी है जिन्हें मन और दिमाग की शांति तब मिलती है जब वो अपने शहर के भीड़ और शोरगुल से निकलकर दुनिया के किसी शांत कोने में अकेले या परिवार के साथ अपना वक़्त बिताते है | यंहा मैं उन दीवानों की बात कर रही हू जिन्हें घूमना बेहद पसंद है| वो लोग  जिन्हें नयी-नयी जगहों पे जाना, नए-नए लोगो से मिलना तथा इस खुबसूरत सी दुनिया का चक्कर लगाना पसंद है |
                                        हफ्ते भर की भाग दौड़ के बाद सप्ताह का अंत अगर आप किसी ऐसी जगह बिताते है जंहा सिर्फ मन को शांति मिलती हो तो यकीन मानिये आपका आने वाला एक और सप्ताह सुकून भरा होगा| वैसे तो दुनिया में पर्यटन स्थल की कोई कमी नहीं है| बस तो अब आप तैयार हो जाईये इस खुबसूरत दुनिया की सैर के लिए|

                                                         “हैदराबाद, मेट्रो सिटी, यंहा जिंदगी लोगो से तेज़ दौडती है” ऐसी लाइन आपने अक्सर पढ़ी होंगी मगर हैदराबाद स्टेशन पर उतरते ही ये पंक्तियाँ सच हो जाती है| सुबह के आठ बजे हो या रात के ग्यारह, यंहा जीवन की रफ़्तार बहुत तेज़ है| हैदराबाद अपने नाईट लाइट्स के लिए काफी फेमस है| रात होते ही यंहा की हलचल भी बढ़ जाती है और सड़कों के किनारे बने होटल्स में लोगो की खासा भीड़ जमा होने लगती है| 

                         हैदराबाद, अपने तहज़ीब और चार-मिनार के लिए जाना जाने वाला शहर| जितना बड़ा ये शहर है उससे भी ज्यादा बड़ा इस शहर का दिल| आंध्र प्रदेश की मूसी नदी के किनारे बसा ये शहर हर साल लाखों से भी ज्यादा सैलानियों का तहे दिल से स्वागत करता है| इस शहर की आबो हवा में ना सिर्फ विदेशी बल्कि स्वदेशी सैलानी भी कुछ इस तरह बह जाते है की अपनी सारी मुश्किलों को भूल जाते है|
                                        1591 में बना चार मीनार, आज हैदराबाद का दिल कहा जाता है | शहर का सबसे बड़ा स्मारक होने के साथ ही यह देश के कुछ प्रसिद्ध, मशहूर और प्राचीन इमारतों का हिस्सा है| साथ-साथ यह पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है| यदि इस मज़्जिद का इतिहास खंगाले तो पता चलता है की सुल्तान मुहम्मद कुली क़ुतुब शाह, क़ुतुब शाही राजवंश के शासक ने इस मस्जिद को बनवाया था और उस वक़्त बने इसके मीनारों से आज भी पूरा शहर आसानी से देखा जा सकता है| कहा तो ऐसा भी जाता है की इसी चार मीनार में एक सुरंग भी है, जो प्राचीन काल के कैदीयों को भागने के उद्देश से बनायीं गयी थी मगर आज तक उस सुरंग का कोई निशान नहीं मिल पाया है|

       जिस तरह ये चार मीनार, हैदराबाद की जान है उसी तरह चार मीनार के इर्द-गिर्द ही लगने वाला “लाद बाज़ार” भी इस शहर की धडकनों में बसता है|
|घर की सजावट का सामान हो या “शरीर की सजावट” का इस बाज़ार में हर तरह का सामान उपलब्ध है| यहाँ की मोती और यहाँ के लैस तो वर्ल्ड फेमस है| लाद बाज़ार का रंग यूँ तो दिन में रहता ही है मगर रात होते-होते इस रंग में चमक बढती जाती है| चार मीनार की छत से ये नज़ारा ऐसा लगता है मनो आसमान में हजारों सितारे अपनी रौशनी से आकर्षित कर रहे हो| इस शहर की एक और चीज़ है जो देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत लोकप्रिय है और वो है यहाँ की “लज़ीज़ बिरयानी’| 


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  वेज से लेकर नॉन वेज तक हर तरह की स्वादिष्ट बिरयानियों के लिए जाना जाता है ये शहर| सिर्फ प्यार से पकाए गये खाने का स्वाद तब और बढ़ जाता है जब उसे प्यार से खिलाया भी जाये| और इस शहर की लाजवाब बिरयानी के स्वाद के पीछे यही एक राज़ है| यंहा की बिरयानी जितनी प्यार से बनाई जाती है उतनी ही प्यार से खिलाई भी जाती है|  तो अब देर किस बात की बांधिए आपना सामान और निकल चलिए एक ऐसे शहर की ओर जिसके अतीत की झलक आज भी यंहा दिखती है|
       
      

                        

Wednesday, 15 January 2014

......“मिनम्मा, मेरी डिशनरी में इम्पॉसिबल का शब्द ही नहीं”.......


                बॉलीवुड मूवी की ये लाइन शायद आज हर बच्चे कि ज़ुबान पे होगी| आज कि इस 21वीं सदी में ये लाइन एकदम फिट बैठती है| आज के समय में दुनिया में कोई भी ऐसी चीज़ नहीं है जो मुमकिन ना हो|  हमारा भारत देश और पूरा संसार इतनी तेज़ी से आगे बढ़ गया है कि उसके लिए कोई भी काम नामुमकिन नहीं है| फिर चाहे वो बीमारी से जुडी कोई परिस्थिति हो या विज्ञान से जुडी, शिक्षा से जुडी हो या आस्था से|

                                   पहले के समय में हमारे बड़े हमसे कहा करते थे कि मेहनत से कुछ भी हासिल हो सकता है, हम किसी भी लक्ष्य तक पहुँच सकते है| वो साडी बाते आज के युग में सच होती सी नज़र आ रही है| आज जन्हा इन्सान चाँद पर झंडे गाड़ चुका है माँ के पेट से मनचाहा बच्चा भी पैदा करवा रहा है| जंहा इन्सानों ने रोबोट बनाकर खुद को साबित किया है वही न जाने कितनी लाइलाज बिमारियों के इलाज खोजे गए है|

       हमारा देश तरक्की और ऊंचाईयों कि उन बुलंदियों को छू रहा है जिसकी आज से 60-70 साल पहले कल्पना भी नहीं कि जा सकती थी|

                                      इतनी तरक्की और कामयाबी के बाद भी भारत में अभी भी कुछ ऐसे गाँव है जंहा लड़कियों कि भ्रूण हत्या कि जाती है, उन्हें पढने लिखने को मना किया जाता है, आज भी भारत में कितने ही लोग दो वक़्त कि रोटी को तरसते है| आज अमीर, और अमीर होता जा रहा है वही गरीब और गरीब होता जा रहा है|

                               क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस विज्ञान से भरी दुनिया में ऐसी मशीन का अविष्कार हो जो भूको को खाना दे, बेरोजगारों को रोज़गार दे और लड़कों के लिए लालची माँ बाप को बुद्धी दे???

                                     विज्ञान चाहे जितनी तरक्की कर ले मगर इस वक़्त उसके पास इनमे से किसी चीजों का इलाज नहीं|  

     

Wednesday, 1 January 2014

WELCOME 2014……………………..


देखते-देखते ये एक और साल बीत गया, साथ छोड़ गया कुछ खट्टी-मीठी यादें| साल के शुभ अवसर पर वैसे तो बत सिर्फ ख़ुशी और हंसी कि करनी चाहिए, बीते सालों में हुई तमाम उन चीजों को नज़र में लाना चाहिए जिनसे हमारे देश और समाज को लाभ मिला है| मगर बीता हुआ पिछला साल भी अपराध के नाम रहा| Crime against women, Murder case, Gang rape, Sexual harassment, Female infanticides, Sex selective abortion, Rape and sexual assault…….चाह कर भी हम कम नहीं कर पाए| हर साल कि तरह ये साल लोगो को ये बताने में बीत गया कि “लडकियाँ, लडकों के बराबर होती है, उनकी इज्ज़त करो, उन्हें माँ बहन का दर्जा दो” मगर फिर भी Crime against women, Gang rape दिन पे दिन बढ़ता चला गया|

                 खून, डकैती, चेन स्नेचिंग आदि मामलों से FIR रजिस्टर भरे पड़े है| इतनी जागरूकता और केम्पेन और तमाम कोशिश के बावजूद Female infanticides, Sex selective abortion जैसे मामले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे है|

       इतनी सारी चीजों के बाद भी इस साल कुछ ऐसा हुआ जिससे हमारा देश आने वाले दिनों में प्रगति कि ऊचाई को छुएगा| जहाँ साल के अंत में दिल्ली गैंग रेप केस पर फैसला सुनाके निर्भया को इंसाफ दिलाया वही अन्ना के लोकपाल बिल के पास होते ही देश में भ्रस्टाचार के ख़त्म होने के 50% चान्स बढ़ गया|

       साल के अंत में ही दिल्ली में केजरीवाल कि सरकार ने आकर देश की जनता को ये दिखा दिया कि आम आदमी अगर चाहे तो कुछ भी नामुमकिन नहीं|

   2013 तो अपने साथ इतनी सारी यादें लेकर चला गया| आने वाले साल 2014 से हमें बहुत सारी उम्मीदें है|

           WELCOME 2014……………………………..