Thursday, 20 July 2017

शीशे का सैलून



"थैंक्यू सो मच मैम फ़ॉर विजिटिंग हियर!!" ऊपर से नीचे काले कपड़ों से ढकी एक ठीक -ठाक कद वाली लड़की ने हाथ मिलाते हुए कहा। पीले रंग का अतरंगा सा कपडा पहने हुए जिस औरत से वो हाथ मिला रही थी उसका सारा ध्यान अपने बालों पर था। एक हाथ में फोन लेते हुए वह औरत आगे बढ़ी और अपने बालों पर उँगलियाँ फेरती रीता के सामने से निकल गयी।
 लाल रंग का कुर्ता और पुरानी सी पीली सलवार पहने रीता ने सामने शीशे के बने बड़े से सैलून को देखा। आस-पास के लोगों से नज़रे बचाकर उसने अपने हाथ में थामा बैग टटोला और खुश हो गयी। रबड़ की चप्पल पहने जब वो सैलून के अंदर पहुंची तो आँखें चकचौन्ध हो गयी। 
अंदर झाँकने पर सभी अमीर ज़ादे सर झुकाये बैठे नज़र आये। "हाऊ कैन आई हेल्प यू मैम"..रीता ने सामने देखा तो मोटे लेंस का चश्मा पहने, खुले बालों वाली लड़की उसे लगातार घूरे जा रही थी। "हाऊ कैन आई हेल्प यू मैम"... "हेयर...कटना...हेयर..कट"। "ओह! नाइस मैम, व्हिच स्टाइल?।" थोड़ी देर शांत होकर रीता ने कुछ सोचा। "माई वेडिंग...टोमारो"। "ओह कांगो!! लेट मी चेक़"। थोड़ी देर कंप्यूटर पर देखने के बाद उसने कहा "दैट्स कट..परफेक्ट फ़ॉर यू,,ओनली इन 850 रूपीज़"।

 आँख तिरछी करके रीता ने फिर से बैग देखा और खुश हो गयी। बगल के दरवाज़े से अंदर जाते हुए उसने खुद को किसी दीपिका और प्रियंका से कम नहीं आँका। ऊपर से नीचे काले रंग का कपड़ा पहने उसी ठीक ठाक दिखने वाली लड़की ने शीशे में रीता को मुस्कुराकर देखा। "योर हेयर इस टू ऑयली मैम, यू नीड या हेयर वाश"। "आ... अ.."। "डोंट वारी, मधु विल गिव यू हेयर वाश" इतना कह कर उसने रीता को दूसरी कुर्सी पर बैठा दिया, जिसमें पीछे पीछे बेसिन जैसा कुछ बना था। रीता ने अपने बगल वाली सीट पे नज़र डाली तो, उल्टे रखे प्लास्टिक के कटोरे में किसी औरत का सर फस गया था..और उसमें से तेज़ धुआं भी निकल रहा था!! रीता कुछ कहने ही वाली थी की कटोरे को हटाकर वो औरत उठी और वंहा से चली गयी। "हियर मैम" रीता के बालों को धोते हुए मधु ने पूछा "व्हिच शैम्पू यू यूज़ मैम....कौन सा शैम्पू लगाती है? " एक्स वाई ज़ेड" "डेट्स वाय योर हेयर इस सो डैमेज, यूज़ ओनली आवर दिस प्रोडक्ट, योर हेयर विल भी सो स्मूद आफ्टर दैट" बाल में तौलिया लपेटके रीता को वापिस उसकी कुर्सी पे बैठाया गया। गर्म हवा फेकने वाली एक पाइप से उसके बालों को सुखाया गया। चारों और गले पे कपड़ा डालने और गर्दन नीचे रखने की वजह से वो खुद को देख नहीं पा रही थी।

 खैर थोड़ी देर बाद उसने सर उठाया तो जैसे तहलका हो गया!! उसके बाल ...उसके बाल तो अब भी वैसे ही थे..बस थोड़ा इधर उधर से मुड़ गए थे, पीछे से भी बाल की लंबाई काम नहीं हुई थी। बस लग रहा था चूहे ने कुतर दिए थे। "यू लुकिंग वैरी गुड" बिना जवाब दिए रीता कुछ देर तक शून्य भाव से शीशे में खुद को देखती रही। "एनी अदर सर्विस?" . . "कुछ और करवाना है क्या" "नहीं" शीशे में खुद को देखते और अपने कपड़े को सही करते वो वापिस सालून के दरवाज़े पर आ गयी। "यू लुकिंग गुड..बेस्ट ऑफ़ लक फ़ॉर योर वेडिंग, योर बिल..मैम...1000 रूपीज़" "आपने तो 850 बोला था?" "यस..ओनली हेयर कट..एक्स्ट्रा फ़ॉर द टैक्स और सर्विस" अब गुस्से से रीता का पारा चढ़ गया..मेज़ पर हाथ मारते हुए ..गले से चीख पड़ी वो.."ये काटा है बाल तुमलोगों ने..ये...अभी भी उतने ही बड़े है मेरे बाल..बेवकूफ बनाते हो तुम सब के सब!! बंद करो ये सब।" पूरे सैलून में सन्नाटा हो गया..सब की निगाहें रीता पर टिक गयी.. "हेलो..हेयर कटिंग सालून" चश्में वाली लड़की के फ़ोन पर इतना कहते ही रीता वापिस आ गयी..आस पास देखा तो सब वैसा ही था..कोई भी उसे घूर नहीं रहा था...रीता ने खुद से कहा ठीक है सब सही था..वो सिर्फ ख्याल था। अपने हाथों में लिए बैग से उसने 100 की दस नोट निकली और उसे देकर वहाँ से बहार आगयी। रास्ते में वापिस आते हुए उसे एक पेड़ के किनारे दिखा, छोटा सा "पारी ब्यूटी पार्लर" "हमारी कल शादी है..बाल कटवाने है"।

Saturday, 17 June 2017

केदारनाथ में आज भी दिखते हैं त्रासदी के निशान





घुमक्कड़ी, एक ऐसा शौक जो समय के साथ जूनून में बदल जाता है। मेरे लिए भी ये शौक जूनून में बदलता जा है। इसी शौक के साथ मैंने इस बार केदारनाथ जाने का फैसला किया। उत्तराखंड में मौजूद हिन्दू मान्यताओं में यह अंतिम जोतिर्लिंगों में आता है । कहते हैं यहाँ के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ जाने वाले लोगों का तो नहीं पता लेकिन मेरा खुद का अनुभव बहुत अनोखा है। देश -दुनिया की हर जगह घूमना एक तरफ और केदारनाथ का अनुभव एक तरफ। जिस तरह केदारनाथ जाना एक सपने जैसा है वैसे ही वंहा से वापिस आने के बाद भी अब वो सभी अनुभव फिर से सपने जैसा ही लगता है।

  घरवालों के लिए मेरा केदारनाथ जाने का यह निर्णय थोड़ा चौकानें वाला था। 2013 कि त्रासदी के बाद सिर्फ कल्पनाओं और मोबाइल की स्क्रीन पर ही बाबा केदार के दर्शन पाकर सभी खुश थे। ऐसे में वंहा जाने का फैसला घर के अन्य लोगों के लिए ज़रा मुश्किल था। लेकिन घुमक्कड़ी का यह शौक उन्हें भी है। बस फिर भोले शंकर का नाम लेकर हमने हरिद्वार का रिज़रर्वेशन करवा लिया। जंहा से गंगाजल भरकर बाबा केदार को चढाने का इरादा था। हरिद्वार से जल लेकर हमारा सफर एक प्राइवेट कार से शुरू हुआ।

 सुबह 9 बजे से गाड़ी की एक खिड़की से मेरी आँखे उस केदार पर्वत को देखने के लिए बेताब थीं। लेकिन 250 किलोमीटर का पहाड़ी सफर इतना आसान भी नहीं था। ऊबड़ खाबड़ रास्तों ने जंहा सब के पेट खराब कर रखे थे वंही चिलचिलाती धूप ने कार के एयर कंडीशनर को चिढाना शुरू कर दिया था। खैर हरिद्वार से ऋषिकेश और रुद्रप्रयाग से होता हुआ हमारा काफिला फाटा तक शाम 7 बजे तक पहुंचा।
सफर करने वाले लोग इस बात को अच्छे से समझते होंगे की अगर ड्राइवर अच्छा हो तो सफर का पता नहीं चलता। हमारे ड्राइवर बिट्टू भी कुछ ऐसा ही था। जिसने केदार नाथ के सफर की कुछ रोचक कहानियां घर वालों को सुनाई थीं। मेरा ध्यान बिट्टू की बातों पर उस समय गया जब उसने कहा वह 2013 में हुए हादसे का गवाह था। भले ही वो ऊपर पहाड़ की चोटी पर न रहा हो लेकिन उस समय हम जैसे ही यात्रियों को सोनप्रयाग पर छोड़ के वह उनका इंतजार कर रहा था। सोनप्रयाग वह जगह है जंहा बहुत से वेरिफिकेशन और जांच पड़ताल के बाद 5 किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक के लिए टैक्सी मिलती है। और फिर गौरीकुंड से शुरू होता है वो रोमांचक सफर जंहा के अनुभव को बताना असम्भव सा है।

मौसम बईमान है बड़ा
हरिद्वार की जला देने वाली गर्मी से निकालकर जब हम शाम 4 बजे तक रूद्र प्रयाग पहुंचे तो मौसम सुहावना हो गया था। गुलाबी शाम और तेज़ हवाओं ने सब के सेहत को फिर से यही कर दिया था। अलखनन्दा नदी के किनारे से आने वाली हवाएं सिहरन पैदा कर तो रही थी लेकिन गर्मी में बहुत देर तक सफर करने के कारण यह बहुत अच्छा भी एहसास करा रही थी। हम कुछ देर रुककर  जब फाटा की और वापिस बढे तो मौसम ने अचानक ही रंग बदल लिया। धुप जैसे कंही गायब हो गयी । सामने पहाड़ पर लगे पेड़ और दिखाई देने वाले जंगल का हरा रंग इतना गहराता गया मानों कुछ देर पहले ही बारिश ने सभी को भिगोया हो। बहार हवा इतनी ठंडी थी की  हमारी खिड़कियां अपने आप ही बंद हो गयी। शाम 7 बजे फाटा पहुँचते ही हमने सबसे पहले चाय पीना और स्वेटर पहनना ज़रूरी समझा। पहाड़ी इलाकों में 7 बजे के बाद कोई भी गाड़ी नहीं चलती इसलिए फाटा ही हमारा आखिरी स्टॉप रहा जंहा पे एक रात बिताकर हमे सुबह 4 बजे केदारनाथ के लिए निकलना था।
सुबह उठके जो नज़ारा आँखों के सामने था वो बेतरीन था। चारों तरफ पहाड़ से घिरा एक छोटा सा क़स्बा था फाटा। पहाड़ इतने करीब थे की मानों हाथ बढ़ाकर पकड़ा जा सके। दूर पहाड़ पर जमी बर्फ को बादलों के पीछे से देखा जा सकता था। ठण्ड तो इतनी थी की दो मोज़े के अंदर भी पैर बर्फ जैसा था। 


अपनी गाड़ी में बैठ कर हम सोनप्रयाग की ओर आगे बढे जंहा से हमे ब्रह्मकुंड के लिए जाना था और वंही से शुरू होनी थी बाबा केदार की यात्रा। जैसे - जैसे हम सोनप्रयाग की और ऊपर जा रहे थे सूरज भी अपनी किरणों से हमे राहत दे रहा था। बहुत से जांच और परिक्षण के बाद हम ब्रह्मकुंड पहुचं चुके थे। जंहा 15 हज़ार घोड़ों का एक दल पहले ही ऊपर की और निकल चुका था । और नीचे घोड़ों के लिए मारा मारी चल रही थी। हमने भी सात लोगों के लिए घोड़े कर लिए थे। लेकिन मुहँ माँगा पैसा देने के बाद भी हमे सिर्फ छः घोड़े ही मिल पाए थे।
खैर आखिरी फैसला यही हुआ की रास्ते में चलते हुए मेरे पापा और एक और रिश्तेदार एक- एक कर अलग- अलग समय पर घोड़ों पर बैठ जायेंगे। मेरे पापा को ना जाने क्या सूझी वो बोले में पैदल चलता हूं आप सबसे आगे मिलूंगा। इतना कह कर वह निकल गए। हम सबने घोड़े की सवारी पहले भी की थी लेकिन सीधे रास्तों पर, पहाड़ का ये रास्ता ऐसा था जैसे हम नीचे खड़े होकर अपने घर की छत को निहार रहे हो। एकदम सीधी चढ़ाई। और रास्ते कच्चे। अगर इन रास्तों पर हिम्मत करके चला भी जाये तो सामने दिखने वाले बोर्ड आपको डराने वाले होंगे जिनमें पहाड़ गिरने के अंदेशों को बार बार बताया जा रहा था। 

एक के पीछे एक लगे घोड़ों की लंबी कतारों में हम सब गाना गाते और अपने घोड़ों वालों से बतियाते ऊपर चढ़ रहे थे। सुबह 11 बजे से शुरू की हुई कि हुई वो चढ़ाई शाम 7 बजे ख़त्म होने वाली थी। अपनी बातों में हम इतने मशगूल थे या यूँ कहे रास्तों से ध्यान हताने के लिए ही शायद इतनी बाते कर रहे थे की किसी को भी पापा का ध्यान तक नहीं आया। 4 किलोमीटर चलकर हमारा काफिला 1 या 1:15 के करीब पहले पड़ाव पर रुका। घोड़ों की हालत तब तक सही लग रही थी जब तक एक घोड़े को ज़मीन पर पागलों की तरह तड़पते नहीं देखा। हमारे सामने ही एक घोड़ा आगे नहीं बढ़ रहा था। उसके मालिक ने पहले तो उसे रस्सी से खींचा फिर उसके पैर पर इतना मारा की वो घोड़ा ज़मींन पर गिर पड़ा। और विरोध में चिल्लाने लगा। 

वंही खड़े होकर हमारे घोड़े वाले ने कुछ बहुत धुंधली सी पहाड़ियों की और इशारा किया। वो पहाड़िया इतनी दूर और इतनी धुंधली थी की ठीक से दिखाई भी न दे रही थी। उन्होंने कहा कि अब अगला पड़ाव वही हैं। पड़ाव!! मतलब वंहा रुकना था? उससे भी आगे हमें कि चढ़ना था। बहुत देर चढ़ाई करने के बाद अब हम उस रास्ते पर थे जंहा एक और बर्फ का पहाड़ था और दूसरी और गहरी खायीं। ऐसे खायीं जिन्हें बादलों ने पूरी तरह ढक लिया था। बर्फ के पहाड़ ज़मींन से लगे हुए थे । जंहा अलग - अलग मुहँ और पोज़ बनाके लोग डीपी खिंचवा रहे थे। बर्फ के पानी से रास्ता इतना ख़राब हो चूका था कि कीचड़ से सने उन रास्तों में किसी का भी पैर फिसले तो वो खायीं और बादल की आगोश में जा गिरे। उसपर घोड़े पे चलना और भी खतरनाक था।
जिस वक्त हम अपने दूसरे पड़ाव तक पहुचें है सबके चेहरे ठण्ड से लाल हो चुके थे। हाथ इतने ठंडे थे की जलती हुई चाय को पकड़ने में गर्म नहीं बल्कि राहत महसूस हो रही थी। लेकिन ये राहत टिकती कहा हैं सब को अब ये बात खाये जा रही थी की नीचे से पैदल चले पापा अभी तक कंही मिले नहीं और अगर वो पीछे हैं तो अब कैसे आएंगे? सब ने अपने अपने मोबाइल से उन्हें फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन अब तक हम मोबाइल नेटवर्क के क्षेत्र से बहुत ऊपर थे। हमने चलने का सिलसिला फिर भी जारी रखा। खड़ी चढ़ाई चढ़ने और बहुत से कच्चे कीचड़ वाले रास्तों को पार करने के बाद हमे घोड़े वालों ने बादलों के बीच लाकर छोड़ दिया। हाँ वो था तो उनका आखिरी पड़ाव ही जंहा बाकी लोग भी थे लेकिन सिवाय धुंध के हमें कुछ नहीं दिख रहा था। सांस लेने में इतना भारीपन महसूस हो रहा था कि हमे कपूर की गोलियां सुंघनी पड़ रही थी। 

पैर आगे बढ़ने के साथ दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। पापा कंहा होंगे ? चढ़े होंगे भी या नहीं ?  जैसे सवाल ना चाहते हुए भी दिमाग को और सुन्न कर रहे थे। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए मैंने एहसास किया की अब हम उस जगह खड़े थे जंहा आज से 4 साल पहले आये सैलाब ने सब ख़त्म कर दिया। जंहा का वाकया सुनकर लोग आज भी काँप जाते हैं। दिमाग में जैसे अपने आप वो काल्पनिक दृश्य बन गया कि उस सामने वाली पहाड़ी से गिरा होगा पानी, उसी से फटकार सरोवर ने अपना अकाल रूप दिखाया होगा। रस्ते में पड़े मलबे , टूटे खंभे, टीन के कुछ टुकड़ों को देख के रूह कांप जाने वाले दृश्य ज़हन में उबरने लगे। -1 के परे पर ना तो चला जा रहा था न बैठा जा रहा था लेकिन मंदिर तक जाने के लिए अभी भी कुछ किलोमीटर पैदल चलना था।

और दिख गया वो अद्भुत नज़ारा
मैं जानती हूँ इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। पहली बार जब उस विशालकाय मंदिर को देखा तो ना जाने क्यों इतना रोई हूँ की आस पास के लोगों ने सहानुभुति देना शुरू कर दिया। विशाल पर्वतों से घिरे एक समतल ज़मींन के टुकड़े पर वो मंदिर मेरे सामने थी जिसे देश तो क्या विदेशों में भी रहस्यमयी मंदिरों में से एक मानते है। आस पास नज़र उठा कर देखा तो टूटे फूटे घर, घर से लटकता कम्बल, उलटी पड़ी पुरानी चप्पल, घर के कुछ सामान, टूटे टावर, टूटी दीवार सब जैसे हादसे का दर्दनाक सच बयां कर रहा था लेकिन केदारनाथ मंदिर की शोभा झालरों और स्पीकरों के साथ गेंदें की मालाओं पर सुशोभित थी।
शायद रोना इसलिए भी और आ रहा था कि मंदिर तक पंहुच आये मगर पापा का अभी तक कोई पता नहीं था। हल्के से उजाले में हमने मंदिर के बगल वाली पुलिस सहायता केंद्र में पापा के नाम की घोषणा भी करवा दी थी लेकिन उसके बाद भी न कोई खबर थी न उनका पता।
अँधेरा अपने चरम पर था रात के 8:30 बजे मंदिर के ठीक सामने वाले होटल की खिड़की खोले में मंदिर के मुख्य द्वार को देख रही थी। ऊपर न तो लाइट थी न इन्वर्टर जैसे सुविधा मोमबती में बैठे के हम सब बस पापा के सही सलामत Eआने का इंतज़ार कर रहे थे।

मिलने बिछड़ने का हो गया अद्भुत अनुभव
अँधेरे कमरे में मंदिर की ओर देख रहे हम सब का ध्यान अचानक टूट गया जब पापा ने दरवाज़ा खोला और अचेत से आकर बिस्तर पर गिर पड़े। खुद ले आसुंओं को रोककर जब हमने उनका हाल पूछा तो समझ आया वह लगातार रो रहे थे। उन्होंने कहा कि "मुझे लगा आज के बाद में तुम सबसे नहीं मिल पाउँगा।" उनका इतना कहना की पूरा माहौल जैसे आंसुओं में बदल गया। सब ने अपने आसुंओं के साथ उस चिंता और घबराहट को बहार निकाला जो बहुत देर से घर करके हमारे अंदर बैठी थी। मंदिर की घंटियों से पता चला की कपाट बंद होने का समय आ गया था।

और रात 3:30 बजे आया दर्शन का नंबर
पांच हज़ार की पर्चियां कटवाकर आप भी भोले बाबा को छु कर दर्शन पा सकते हैं। बस अन्तर यही होगा की उसमें आपको मंदिर के मुख्य द्वार से नहीं बल्कि पीछे के द्वार से अंदर ले जायेंगे। खैर धांधली तो हर जगह है। और बिना पैसे अब भगवान् के दर्शन भी संभव नहीं हैं। हमने भी दर्शन करके मंदिर के गर्भ गृह को छोड़ दिया। घी की मालिश हो या पांडवों की प्रतिमा पर ठण्ड से जमा घी। सभी दृश्य आँखों में कैद करने वाले थे। काले पत्थरों से बना मंदिर का गर्भ गृह पुराने समय की नक्काशियों को दिखाता है।
दर्शन करके जब हम बहार आये तो पारा - 3 तक पहुच चूका था। सुबह होने में अभी कुछ घंटे बचे थे जिसे हमने रज़ाई में बिताना ज़्यादा सही समझा।
सुबह 7 बजते ही हमने होटल से बहार देखा तो एक पल को धोखा हो गया। लगा मंदिर के पीछे नीलकंठ पर्वत पर किसी ने चांदी का वर्क किया हो। लेकिन उस विशालकाय पर्वत पर सूरज की पहली रौशनी पड़ते ही फिर से दिल खुशमिज़ाज़ हो गया। इतना रूमानी दृश्य और रुई से जैसे कोमल बर्फ की परते अपनी और आकर्षित करने लगी। ये सभी नज़ारा देख कर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि कभी इस खुबसूरत दृश्य ने एक भयानक रूप लिया होगा। हमारे होटल वाले ने पहाड़ के पीछे से आने वाले उस रास्ते को दिखाया जिससे सैलाब वाला पानी नीचे आया था। पहाड़ पर बने उस 30 से 40 फुट निशान को देख कर ही पानी के धार का अंदाज़ा लगाया जा सकता था।
बातों बातों में होटल के मालिक आनंद ने हमे बताया कि जिस होटल में हम रुके थे 2013 के पहले वह तीन मंजिला हुआ करता था। लेकिन उस भीषण सैलाब ने होटल की दो इमारतों को ज़मीन में धंसा दिया था। हमने जब बहार निकालकर देखा तो सच में हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन अंदर धँसी पड़ी थी। जिनमें सिर्फ कुछ फटे पुराने कपडे, कम्बल, और मलबे थे। सरकार चाहते हुए भी उसे साफ़ नहीं करवा प् रही है। 6 महीने कपाट खुलने से भीड़ इतनी हो जाती है कि उनके इंतज़ाम में समय चला जाता है। और बाकी के 6 महीनों में मौसम का हाल खुद ही समझा जा सकता है।

हेलीकाप्टर और मेडिकल की है सुविधा
वैसे तो पैदल चढ़ना ही यात्रा का असली मतलब होता है लेकिन सरकार ने यात्रियों की सुविधाओं के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा चला दी है। ऑनलाइन बुकिंग करवाकर आप दिन भर की चढ़ाई को सिर्फ 20 मिनट में पूरी कर सकते है। इसके साथ ही रास्ते में चलते वक़्त या मंदिर के पास भी मेडिकल कैम्पों की अच्छी व्यवस्था है जिसका उपयोग किया जा सकता है।

Friday, 27 May 2016

कंपनी बाग की दीवारों पर सेल्फी लेने की होड़



जिस कंपनी बाग की दीवार पर सिर्फ पान की पीक और कचड़े का ढेर दिखाई देता था, वहां आज सेल्फी लेने की होड़ सी मची है। आजाद पार्क  की दीवार पर बनीं रंग-बिरंगी आकृतियों के साथ युवा सेल्फी लेने के लिए उतावले नजर आते हैं।
शहर को स्मार्ट बनाने में जितना काम सरकार कर रही है उतना ही काम शहर के युवा भी कर रहे हैं। तेजी से बनते हुए आजाद पार्क की दीवारों पर जल्द ही देश की इतिहास को बताती हुई कलाकृतियां दिखाई देंगी। कंपनी बाग की दीवार पर वॉल पेंटिंग का काम शुरू किया गया है। जिसका उद्देश्य आजाद पार्क को सुन्दर बनाने के साथ लोगों को देश की वर्तमान स्थिति दिखाना है। अप्रैल के तीसरे हफ्ते से शुरू हुए इस वॉल पेंटिंग में कंपनी बाग का एक हिस्सा सजाया जा रहा है।

बीएफए डिपार्टमेन्ट के सात बच्चों ने किया है पहल
कंपनी बाग के सौंदर्यीकरण के लिए बनाई जा रही वॉल पेंटिंग इविवि के छात्र बना रहे हैं। बीएफए और एमफए कर रहे सात छात्रों का समूह शाम चार बजे से रात दस बजे तक दीवारों पर पेंटिंग और स्केचिंग करता है। शहर के लल्ला चुंगी चौराहे और निराला सभागार की दीवारों पर बनीं पेंटिंग भी छात्रों के इसी समूह ने बनाई हैं।

पेंटिंग से दे रहे हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश
बीएफए के पुराछात्र और समूह के लीडर अमरेन्दु सिंह ने बताया कि दीवारों पर बनाई जा रही पेंटिंग्स का अपना अलग-अलग महत्व है। ट्रेडिशनल चीजों और प्रचीन इतिहास को देश की वर्तमान स्थिति से जोड़ते हुए रंगों के माध्यम से दिखाने की कोशिश की जा रही है।

दीवार पर नीले, पीले और सफेद रंग से बनी पेंटिंग में खोखले पेड़ों के अन्दर सिर्फ ऊंची-ऊंची इमारतें दिखाई गई हैं। इन खोखले तनों और इमारतों के बीच विलुप्त होते हुए जानवरों को बचाने का संदेश दिया गया है।

Thursday, 21 April 2016

और एक बार फिर पृथ्वी को हरा-भरा रखने का लेंगें संकल्प

पर्यावरण को नहीं बचाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इंन्सानी जिंदगी को बचाने और बनाने का एक मात्र उपाय है पर्यावरण को बचाना। इसके लिए हमें जी जान से कोशिश करनी होगी। ऐसे भाषण अक्सर संगोष्ठियों और नेता, अभिनेताओं के मुंह से सुनने को मिलते हैं। पर्यावरण को बचाने और संवारने के लिए सरकार के द्वारा भी बहुत से निर्देश दिए गए हैं। जहां तक बात करें शहर की तो जल्द ही शहर स्मार्ट होने की कगार पर है। चमचमाती सड़कें, पर्यटन स्थल और पार्किंग स्लोट। इस स्मार्ट होते शहर में कहीं ना कहीं हम पर्यावरण को धोखा दे रहे हैं।

दिन-रात हो रही कड़ी मेहनत से शहर को नया लुक देने की कोशिश की जा रही है। गाड़ियों और साइकिलों के लिए अलग-अलग रास्ते बनाएं जा रहे हैं। पर्यावरण की दृष्टि से इन सड़कों के बीच हजारों नए पौधे भी लगाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि 45 डिग्री तापमान में जहां इन्सान सूखे जा रहे हैं वहां यह सभी पौधे बड़े ही आसानी से जिंदा बचे रह सकते हैं। अपनी जिंदगी की शुरूआत कर रहे आठ इंच के इन पौधों को जहां शहर की सुन्दरता के लिए लगाया जा रहा है वहीं बगल में लगे 35 फुट बड़े और लगभग दस साल पुराने पेड़ को बेरहमी से काट भी दिया गया है।
शासन-प्रशासन से सहमति लेकर भले ही इस पेड़ को काटा गया हो लेकिन शहर के लोगों और चौराहे पर खड़ी ट्रेफिक पुलिस को छांव देने वाले इस पेड़ को भी शहर के सौन्दर्यीकरण होने का शिकार होना पड़ा है। जहां पेड़ों का समूह अपने साथी के कटने का दुख मनाएगा वहीं पृथ्वी दिवस पर एक बार फिर इंसान पेड़ को कटने से बचने और पर्यावरण बचाने का संकल्प लेंगें।

Saturday, 16 April 2016

आलसी के साथ विरोधियों का शहर भी घोषित होना चाहिए इलाहाबाद

सात बजे के अलार्म और सुबह की एक कप चाय। दही-जलेबी के साथ अंगाड़ाई और भर पेट पराठे के साथ सुबह का नश्ता। खाने के शौकीन इस शहर को हमेशा से ही आलसी शहर का टैग मिलता रहा है। कभी काम के मामले में तो कभी घूमने के मामले में। प्रयाग के वासी हमेशा से ही एक ढर्रे पर चलने के आदि हो चुके हैं।
सुबह सात बजे उठकर मौज से नाश्ता, छह घंटे ऑफिस के बाद घर और फिर रात नौ बजे तक बिस्तर। ऐसे में शहर में हो रही कई नई और अच्छी चीजों की शुरूआत को भी हम अपने रवैये से खराब होने का दर्जा दे डालते हैं। जिसे गहराई से सोचकर देखें तो शहर आलसी होने के साथ एक विरोधाभास प्रकृति का भी होता जा रहा है।
शहर के सुन्दरीकरण के लिए शहर में जगह-जगह नए काम हो रहे हैं। जहां बजट में तीन फ्लाईओवरों की सौगात मिली है तो वहीं शहरों के पर्यटन स्थलों और पार्कों को सुंदर बनाया जा रहा है। इन सभी के बीच आजाद पार्क में लगने वाले टिकट शुल्क को लेकर शहर में सबसे ज्यादा गहमा-गहमी है। टिकट की प्रक्रिया वापिस लो और टिकट नहीं लगना चाहिए के साथ आजाद को बांध दिया जा


एगा जैसे वाक्यों के साथ शहर का एक हिस्सा आवाज उठा रहा है। सोचने वाली बात यह है कि बड़े होटलों में खाना खाने के बाद पांच रुपये टिप्स देना हो या गंगा-यमुना पुल क्रॉस करते समय नदी में मन्नत मांगते हुए पैसे फेंकना हो। इन सभी चीजों में शहर का एक भी सदस्य आवाज नहीं उठाता लेकिन शहर की सफाई और पार्कों को सुन्दर बनाएं अथवा उसके मेनटेनेन्स के लिए लिए जाने वाले शुल्क पर सबको नामंजूरगी है।
कभी धरना तो कभी बैठक शुल्क हटाने के लिए शहर के लोगों ने अजीबो-गरीब तरीके की दलीलें देने भी शुरू किए हैं। इन सभी घटनाओं को देखकर प्रयाग सिर्फ आलसी ही नहीं बल्कि विरोधियों का शहर भी समझ में आने लगा है।

Wednesday, 22 April 2015

सिविल लाइन्स



पुराना मोहल्ला, नए कलेवर में
इलाहाबाद, जिसके नाम का मतलब ही “आल्लाह का आबाद किया” हो उससे भला कौन नहीं जानना चाहेगा| यूँ तो ये शहर अपने आप में ही एक दिलचस्ब इतिहास समेटे हुए है परन्तु इस शहर में आज भी कुछ ऐसे मुहल्ले है जिनका इतिहास बेहद रूमानियत भरा है | उन्ही में से एक है...शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइंस | इलाहाबाद की जान कहे जाने वाला ये इलाका शहर के मध्य में बसा है | बात करे यदि यहाँ के इतिहास की तो ब्रिटिश के ज़माने से ही रहीसों का इलाका रहा है | यंहा किसी भी साधारण हिन्दुस्तानी का जाना लगभग मुश्किल सा था | समय बीता, देश ने अपनी आज़ादी की हवा में सांस लेना शुरू कर दिया और इसी के साथ इलाहाबाद के इस इलाके में भी बदलाव आना शुरू हो गया | लेकिन इस इलाके में वही शानो-शौकत दिखती है जो कभी अंग्रेजो के ज़माने में हुआ करती थी..आज भले ही समय के साथ लोगो ने खुद को बदल लिया हो मगर इलाके की शान आज भी उसी अंदाज़ में बरक़रार है | अंग्रेजों के आने से पहले इलाहाबाद का स्वरुप कुछ अलग ही था| दक्षिण में जहांगीर द्वारा बसाया गया मोहल्ला खुल्दाबाद, पूर्व में झूंसी और अन्य कुछ मोहल्ले थे| 19वीं शताब्दी के मध्य में जब अंग्रेज़ी सेना प्रयाग में आई तब से प्रयाग का रंग रूप ही बदलने लगा| कई ऐसे मोहल्ले बसाए गए जो सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही थे| अब ज़रूरत थी ऐसे मोहल्ले की जहाँ अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए निकल सके| ब्रिटेन की तर्ज़ पर यहाँ पर भी उसी तरह के मोहल्लों को बसाने की योजना शुरू हुई|

सन् 1857 में ग़दर के पश्चात्, ‘कडबर्ट बेन्स्ले थोर्न्हिलकी मेहनत से सिविल लाइन्स को बसाया गया| ये शहर का सबसे प्रतिष्ठित इलाका हुआ करता था| शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइन्स पहले सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही बना था| यहाँ किसी भी भारतीय को जाने की अनुमति नहीं थी| कहा जाता है की शाम के वक़्त अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ घूमने निकलते थे| भारत के दूसरे कई शहरों में सिविल लाइन्स देखने को मिलता है|
सिविल लाइन्स स्थित अल्फ्रेड पार्कभी अपने में इस इलाके की शान है| ये पार्क कंपनी बागके नाम से जाना जाता है क्यूंकी पहले यहाँ अंग्रेज़ पलटन रुका करती थी| यहाँ पर पहले मेवातियों के आठ गाँव थे जिनमें छीतपुर और सम्दाबाद नाम के भी गाँव शामिल थे| इन गाँवों को उजाड़ कर यहाँ पर कम्पनी बाग बनवाया गया था| इसी कंपनी बाग में चंद्रशेखर आज़ादको अंग्रेज सैनिकों ने गोली मारी थी| अब इस बाग का नाम चंद्रशेखर आज़ाद पार्करख दिया गया है|


यूँ तो किसी भी शहर का मिजाज़ जानने के लिए उसके इतिहास का ज्ञान बेहद आवश्यक है मगर इस बात में कोई दो राय नहीं की इस इलाके की पहचान यंहा के खानों से भी है | बात चाहे यहाँ के बड़े होटलों में मिलने वाला बेहतरीन मलाई कोफ्ता हो या सिविल लाईन्स की सडको पे मिलने वाला चिकन कबाब, यंहा का ज़ायका आपको मजबूर कर देगा इसका स्वाद चखने के लिए | सिर्फ यही नहीं जैसे-जैसे समय करवट ले रहा है वैसे-वैसे इस इलाके की मिठासभी बढती जा रही है | सिर्फ लोगो के खान-पान में ही नहीं बल्कि इस इलाके के लोगो के स्वभाव में भी चाशनी सी घुलती हुई प्रतीत होती है | इस इलाके की सबसे खास बात ये है की यंहा किसी भी ज़बान को सुकून दिलाने वाला स्वाद मौजूद है फिर चाहे वो शाकाहारी हो या मांसाहारी |
सिविल लाइंस न सिर्फ अपने इतिहास बल्कि अपने स्वाद के लिए भी काफी मशहूर है | यंहा ठेले पे मिलने वाली चाट हो या पिछले दो दशकों से प्रसिद्ध खोखा राय का दही बड़ा”, आज भी लोगो को अपनी ओर उसी लाजवाब खुशबू से आकर्षित करता है | खोखा राय के इस दही भल्ले ने पूरे शहर में अपना ऐसा चटपटा स्वाद छोड़ा है की पूरे शहर की आबादी में कुछ ही ऐसे होंगे जिन्होंने इस लज़ीज़ भल्लो को ना चखा हो | उड़द के दाल से बने ये नमकीन भल्ले, जिनमे मेवों का भी भरपूर इस्तेमाल होता है, जब दही के साथ मिलते है तो पूरे मुंह का स्वाद लाजवाब हो जाता है | इन दही भल्लो में कुछ ऐसा जादू सा है की सिर्फ एक से किसी का मन नहीं भरता...मजबूरन आपको एक और प्लेट लेनी ही पड़ती है | और यकीन मानिये अगर आपने इस दही-भल्ले को एक बार खाया तो जिंदगी भर उसके स्वाद की मिठास आपके ज़बान पे रहेगी |
बात करे यदि सिविल लाईन्स के स्वाद की इतिहास की, तो सबसे पहले जुबान पर जो नाम आता है वो है इस इलाकें की सबसे पुरानी मिठाई की दुकान कामधेनू” | यहाँ बनने वाली सभी मिठाइयों का ज़ायका सिर्फ देशी ही नही, विदेशी भी पूरी तरीके से उठाते है | यहाँ की बनी मिठाइयो में सबसे मशहूर है काजू की कतली |

शहर के सबसे पुराने सिनेमा हॉल के ठीक बगल में बनी ये दुकान लोगो के जीभ को आज भी संतुष्ट कर रहा है | मिठाई के बाद यदि सबसे प्रसिद्ध कोई पेय व्यंजन इस इलाके का है तो वो है इलाहाबाद का सबसे पुराना और सबसे नामचीन कौफ़ी हाउस” | ये इमारत न सिर्फ अपनी लज़ीज़ कौफ़ी के लिए जाना जाता है बल्कि इसी इमारत की छत के नीचे बैठकर देश और दुनिया की तमाम बाते, फिर चाहे वो राजनीती से जुडी हो या सामाजिक, उन सभी का निवारण इस इमारत के नीचे चाय और कौफ़ी की चुस्कियों के साथ निकला जाता है |
सिविल लाइंस भले ही अतीत के पन्नो के बीच खड़ा हो लेकिन इस इलाके ने खुद को समय के बदलते दौर के साथ बड़ी तेज़ी से बदल लिया है | एक समय में यह इलाका खाने की दृष्टि से सिर्फ पारम्परिक ही माना जाता था | अर्थात पहले यंहा सिर्फ परम्परागत खाना ही मिलता था लेकिन जैसे-जैसे समय बदला लोगो की मांग बढ़ी वैसे-वैसे इस इलाके ने भी खुद को बदला और परम्परागत खानों से हट कर कुछ नया और पश्चिमी सभ्यता वाले व्यंजन को अपने थाली में परोसा | ये सभी व्यंजन आज न सिर्फ लोगो को भाह रहे है बल्कि आज इस शहर में काम करने वाले लगभग पचास प्रतिशत नौजवान इन्ही व्यंजनों के सहारे अपना दिन गुज़रते है | इन पश्चिमी व्यंजनों में सबसे पहला और सबसे मशहूर है बर्गर’ | इसी के चलते विदेशो की कंपनियों ने अपनी फ़्रेनचाईज़ी इलाहाबाद शहर के सिविल लाइंस इलाके में खोला | जो आज सारे जिसका नाम आज सभी के ज़बान में रहता है मैक-डोनल्ड” | इसी के साथ शुरू हुआ इस आधुनिकीकरण का भोजन आज लोगो के बीच काफी मशहूर है | बर्गर के साथ ही पिज़्ज़ा की दीवानगी, की एक लहर इस शहर में ऐसी चली जिससे कोई अछूता नहीं रह पाया, फिर चाहे वो बच्चा हो या नौजवान | महिला हो या बुज़ुर्ग, आज सभी की ज़बान पे डोमिनोज”, और पिज़्ज़ा हटकी रट लगी रहती है |


इन सभी के अलावा फ्रेंच और चाइनीज़ व्यंजनों का भी एक दौर सा शुरू हो गया | जहा लोग सिविल लाइंस के मशहूर रेस्तरा शहंशाहकी चाऊमीन के दीवाने हो गये वही होटल कान्हा श्याममें मिलने वाला मोमोज़का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में पानी आने लगा | सिर्फ यही नहीं वर्तमान समय ने एक बार फिर करवट ली है और इन सभी के अलावा पुरे शहर में एक बार फिर से एक नए दौर ने जन्म लिया है | आज के लोगो के बीच अब सिर्फ पिज़्ज़ा, बर्गर के अलावा नॉन-वेज का शौक भी देखा जा सकता है |



ऐसा बिलकुल नहीं है की प्राचीन समय में लोग मांस खाया ही नहीं करते थे..परन्तु आज की तुलना में उस वक़्त मांसाहारियों की संक्या काफी कम हुआ करती थी | लोगो की ही बढती डिमांड को देखते हुए इस इलाके ने भी आपने आप को बदला और परम्परागत और पश्चिमी खाने के साथ ही लोगो ने मांस से बने व्यंजनों को भी तवज्जों दिया | इसी प्रक्रिया को और आगे बढ़ाने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चिकेन की फ़्रेनचाईज़ी के.एफ.सी.ने इस शहर में अपनी जड़े मज़बूत करनी शुरू कर दी | और आज आलम ये है की दिन हो या शाम इस इमारत में आपको हर समय भीड़ ही दिखाई देगी | इसी के साथ ही पिछले कुछ सालों से एक और बहुत ही फेमस स्ट्रीट शॉप जो लोगो की ज़बान पे रहती है, और जहाँ की चिकेन बिरयानी पुरे शहर में बेहद मशहूर है उसका नाम है इट-ऑन” | यहाँ की बिरयानी के बारे में तो लोग कुछ यु कहते है की अगर आपने इट-ऑन की बिरयानी नहीं खायी तो आपने कुछ नहीं खाया | और वाकई में इस बिरयानी का स्वाद एक दम अलग और जायकों से भरा है |