Wednesday, 22 April 2015

सिविल लाइन्स



पुराना मोहल्ला, नए कलेवर में
इलाहाबाद, जिसके नाम का मतलब ही “आल्लाह का आबाद किया” हो उससे भला कौन नहीं जानना चाहेगा| यूँ तो ये शहर अपने आप में ही एक दिलचस्ब इतिहास समेटे हुए है परन्तु इस शहर में आज भी कुछ ऐसे मुहल्ले है जिनका इतिहास बेहद रूमानियत भरा है | उन्ही में से एक है...शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइंस | इलाहाबाद की जान कहे जाने वाला ये इलाका शहर के मध्य में बसा है | बात करे यदि यहाँ के इतिहास की तो ब्रिटिश के ज़माने से ही रहीसों का इलाका रहा है | यंहा किसी भी साधारण हिन्दुस्तानी का जाना लगभग मुश्किल सा था | समय बीता, देश ने अपनी आज़ादी की हवा में सांस लेना शुरू कर दिया और इसी के साथ इलाहाबाद के इस इलाके में भी बदलाव आना शुरू हो गया | लेकिन इस इलाके में वही शानो-शौकत दिखती है जो कभी अंग्रेजो के ज़माने में हुआ करती थी..आज भले ही समय के साथ लोगो ने खुद को बदल लिया हो मगर इलाके की शान आज भी उसी अंदाज़ में बरक़रार है | अंग्रेजों के आने से पहले इलाहाबाद का स्वरुप कुछ अलग ही था| दक्षिण में जहांगीर द्वारा बसाया गया मोहल्ला खुल्दाबाद, पूर्व में झूंसी और अन्य कुछ मोहल्ले थे| 19वीं शताब्दी के मध्य में जब अंग्रेज़ी सेना प्रयाग में आई तब से प्रयाग का रंग रूप ही बदलने लगा| कई ऐसे मोहल्ले बसाए गए जो सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही थे| अब ज़रूरत थी ऐसे मोहल्ले की जहाँ अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए निकल सके| ब्रिटेन की तर्ज़ पर यहाँ पर भी उसी तरह के मोहल्लों को बसाने की योजना शुरू हुई|

सन् 1857 में ग़दर के पश्चात्, ‘कडबर्ट बेन्स्ले थोर्न्हिलकी मेहनत से सिविल लाइन्स को बसाया गया| ये शहर का सबसे प्रतिष्ठित इलाका हुआ करता था| शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइन्स पहले सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही बना था| यहाँ किसी भी भारतीय को जाने की अनुमति नहीं थी| कहा जाता है की शाम के वक़्त अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ घूमने निकलते थे| भारत के दूसरे कई शहरों में सिविल लाइन्स देखने को मिलता है|
सिविल लाइन्स स्थित अल्फ्रेड पार्कभी अपने में इस इलाके की शान है| ये पार्क कंपनी बागके नाम से जाना जाता है क्यूंकी पहले यहाँ अंग्रेज़ पलटन रुका करती थी| यहाँ पर पहले मेवातियों के आठ गाँव थे जिनमें छीतपुर और सम्दाबाद नाम के भी गाँव शामिल थे| इन गाँवों को उजाड़ कर यहाँ पर कम्पनी बाग बनवाया गया था| इसी कंपनी बाग में चंद्रशेखर आज़ादको अंग्रेज सैनिकों ने गोली मारी थी| अब इस बाग का नाम चंद्रशेखर आज़ाद पार्करख दिया गया है|


यूँ तो किसी भी शहर का मिजाज़ जानने के लिए उसके इतिहास का ज्ञान बेहद आवश्यक है मगर इस बात में कोई दो राय नहीं की इस इलाके की पहचान यंहा के खानों से भी है | बात चाहे यहाँ के बड़े होटलों में मिलने वाला बेहतरीन मलाई कोफ्ता हो या सिविल लाईन्स की सडको पे मिलने वाला चिकन कबाब, यंहा का ज़ायका आपको मजबूर कर देगा इसका स्वाद चखने के लिए | सिर्फ यही नहीं जैसे-जैसे समय करवट ले रहा है वैसे-वैसे इस इलाके की मिठासभी बढती जा रही है | सिर्फ लोगो के खान-पान में ही नहीं बल्कि इस इलाके के लोगो के स्वभाव में भी चाशनी सी घुलती हुई प्रतीत होती है | इस इलाके की सबसे खास बात ये है की यंहा किसी भी ज़बान को सुकून दिलाने वाला स्वाद मौजूद है फिर चाहे वो शाकाहारी हो या मांसाहारी |
सिविल लाइंस न सिर्फ अपने इतिहास बल्कि अपने स्वाद के लिए भी काफी मशहूर है | यंहा ठेले पे मिलने वाली चाट हो या पिछले दो दशकों से प्रसिद्ध खोखा राय का दही बड़ा”, आज भी लोगो को अपनी ओर उसी लाजवाब खुशबू से आकर्षित करता है | खोखा राय के इस दही भल्ले ने पूरे शहर में अपना ऐसा चटपटा स्वाद छोड़ा है की पूरे शहर की आबादी में कुछ ही ऐसे होंगे जिन्होंने इस लज़ीज़ भल्लो को ना चखा हो | उड़द के दाल से बने ये नमकीन भल्ले, जिनमे मेवों का भी भरपूर इस्तेमाल होता है, जब दही के साथ मिलते है तो पूरे मुंह का स्वाद लाजवाब हो जाता है | इन दही भल्लो में कुछ ऐसा जादू सा है की सिर्फ एक से किसी का मन नहीं भरता...मजबूरन आपको एक और प्लेट लेनी ही पड़ती है | और यकीन मानिये अगर आपने इस दही-भल्ले को एक बार खाया तो जिंदगी भर उसके स्वाद की मिठास आपके ज़बान पे रहेगी |
बात करे यदि सिविल लाईन्स के स्वाद की इतिहास की, तो सबसे पहले जुबान पर जो नाम आता है वो है इस इलाकें की सबसे पुरानी मिठाई की दुकान कामधेनू” | यहाँ बनने वाली सभी मिठाइयों का ज़ायका सिर्फ देशी ही नही, विदेशी भी पूरी तरीके से उठाते है | यहाँ की बनी मिठाइयो में सबसे मशहूर है काजू की कतली |

शहर के सबसे पुराने सिनेमा हॉल के ठीक बगल में बनी ये दुकान लोगो के जीभ को आज भी संतुष्ट कर रहा है | मिठाई के बाद यदि सबसे प्रसिद्ध कोई पेय व्यंजन इस इलाके का है तो वो है इलाहाबाद का सबसे पुराना और सबसे नामचीन कौफ़ी हाउस” | ये इमारत न सिर्फ अपनी लज़ीज़ कौफ़ी के लिए जाना जाता है बल्कि इसी इमारत की छत के नीचे बैठकर देश और दुनिया की तमाम बाते, फिर चाहे वो राजनीती से जुडी हो या सामाजिक, उन सभी का निवारण इस इमारत के नीचे चाय और कौफ़ी की चुस्कियों के साथ निकला जाता है |
सिविल लाइंस भले ही अतीत के पन्नो के बीच खड़ा हो लेकिन इस इलाके ने खुद को समय के बदलते दौर के साथ बड़ी तेज़ी से बदल लिया है | एक समय में यह इलाका खाने की दृष्टि से सिर्फ पारम्परिक ही माना जाता था | अर्थात पहले यंहा सिर्फ परम्परागत खाना ही मिलता था लेकिन जैसे-जैसे समय बदला लोगो की मांग बढ़ी वैसे-वैसे इस इलाके ने भी खुद को बदला और परम्परागत खानों से हट कर कुछ नया और पश्चिमी सभ्यता वाले व्यंजन को अपने थाली में परोसा | ये सभी व्यंजन आज न सिर्फ लोगो को भाह रहे है बल्कि आज इस शहर में काम करने वाले लगभग पचास प्रतिशत नौजवान इन्ही व्यंजनों के सहारे अपना दिन गुज़रते है | इन पश्चिमी व्यंजनों में सबसे पहला और सबसे मशहूर है बर्गर’ | इसी के चलते विदेशो की कंपनियों ने अपनी फ़्रेनचाईज़ी इलाहाबाद शहर के सिविल लाइंस इलाके में खोला | जो आज सारे जिसका नाम आज सभी के ज़बान में रहता है मैक-डोनल्ड” | इसी के साथ शुरू हुआ इस आधुनिकीकरण का भोजन आज लोगो के बीच काफी मशहूर है | बर्गर के साथ ही पिज़्ज़ा की दीवानगी, की एक लहर इस शहर में ऐसी चली जिससे कोई अछूता नहीं रह पाया, फिर चाहे वो बच्चा हो या नौजवान | महिला हो या बुज़ुर्ग, आज सभी की ज़बान पे डोमिनोज”, और पिज़्ज़ा हटकी रट लगी रहती है |


इन सभी के अलावा फ्रेंच और चाइनीज़ व्यंजनों का भी एक दौर सा शुरू हो गया | जहा लोग सिविल लाइंस के मशहूर रेस्तरा शहंशाहकी चाऊमीन के दीवाने हो गये वही होटल कान्हा श्याममें मिलने वाला मोमोज़का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में पानी आने लगा | सिर्फ यही नहीं वर्तमान समय ने एक बार फिर करवट ली है और इन सभी के अलावा पुरे शहर में एक बार फिर से एक नए दौर ने जन्म लिया है | आज के लोगो के बीच अब सिर्फ पिज़्ज़ा, बर्गर के अलावा नॉन-वेज का शौक भी देखा जा सकता है |



ऐसा बिलकुल नहीं है की प्राचीन समय में लोग मांस खाया ही नहीं करते थे..परन्तु आज की तुलना में उस वक़्त मांसाहारियों की संक्या काफी कम हुआ करती थी | लोगो की ही बढती डिमांड को देखते हुए इस इलाके ने भी आपने आप को बदला और परम्परागत और पश्चिमी खाने के साथ ही लोगो ने मांस से बने व्यंजनों को भी तवज्जों दिया | इसी प्रक्रिया को और आगे बढ़ाने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चिकेन की फ़्रेनचाईज़ी के.एफ.सी.ने इस शहर में अपनी जड़े मज़बूत करनी शुरू कर दी | और आज आलम ये है की दिन हो या शाम इस इमारत में आपको हर समय भीड़ ही दिखाई देगी | इसी के साथ ही पिछले कुछ सालों से एक और बहुत ही फेमस स्ट्रीट शॉप जो लोगो की ज़बान पे रहती है, और जहाँ की चिकेन बिरयानी पुरे शहर में बेहद मशहूर है उसका नाम है इट-ऑन” | यहाँ की बिरयानी के बारे में तो लोग कुछ यु कहते है की अगर आपने इट-ऑन की बिरयानी नहीं खायी तो आपने कुछ नहीं खाया | और वाकई में इस बिरयानी का स्वाद एक दम अलग और जायकों से भरा है |

Friday, 17 April 2015

क्यूँ नेताजी की मौत आज भी है “इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप’



भारत की आज़ादी में शरीक कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी है जो बड़े ही शांत और कोमल तरीके से देश को आज़ादी दिलाने में लगे थे लेकिन उन्ही में से कुछ ऐसे भी थे जिनकी बोलियों में ही देश के प्रति सम्मान और देश के दुश्मनों के प्रति गुस्सा साफ़ झलकता था | ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों में सबसे पहला नाम है ‘नेताजी’ का |

 “आज़ाद हिन्द फौज” की स्थापना तथा ‘तुम मुझे खून दो और में तुम्हे आज़ादी दूंगा’ का नारा देने वाला ये व्यक्तित्व देश में अपनी एक मिसाल पैदा कर गया | लोगो को सिर्फ अपनी बात से प्रभावित करने वाला ये शख्स आज हमारे बीच तो नहीं है लेकिन आज भी इनकी मौत रहस्य के घेरे में है | आज आज़ादी के 70 दशक बाद भी इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है की नेता जी विमान हादसे के शिकार हुए थे या किसी साज़िश के | नेताजी की मौत के इन तमाम किस्सों और कहानियों के बीच 11 अप्रैल को एक और खुलासा सामने आया है | लेखक अनुज धर की किताब ‘इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप’ में अब तक के सबसे बड़े खुलासे को बताया गया है |
लेखक अनुज धर ने अपनी इस किताब में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस के सभी लीडरों पर ये आरोप लगाया है की ये सभी वर्तमान समय तक सच को छुपाते रहे है और नेताजी से जुड़े सभी मामलों को जनता के बीच पहुचने से रोकते रहे है | धर का कहना है की कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों में सिर्फ 41 दस्तावेजों को ही अब तक सार्वजनिक किया गया है जबकि बाकी बचे दस्तावेजों में नेताजी और नेताजी से जुड़े से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते है | इन्ही  सार्वजिक हुए दस्तावेजों में से मिली जानकारी के आधार पर ही लेखक अनुज धर ने कुछ खुलासे किये है | लेखक धर ने इस बात का आरोप लगाया है की ये तमाम कोंग्रेसी नेता सुभाष जी की मौत की साजिश में शामिल हो सकते है |इस खुलासे के साथ ही धर ने अपनी किताब में ये भी दावा किया है की ‘बंगाली दादा’ की मौत के दस दशकों बाद तक उनके परिवार वालों की जासूसी की जाती रही है | ताइवान के हवाई दुर्घटना के बाद (जस्टिस जी डी खोसला के रिपोर्ट के अनुसार) नेता जी की मौत हो गयी | जंहा लोगो को ये जानकर आश्चर्य होगा वही मौत के इतने दशकों बाद इस खुलासे से लोग अचम्भे में है की मौत के दो दशकों बाद तक नेता जी के परिवार की जासूसी होती रही है |

 नेताजी की मौत की कारवाही करने के लिए जिन दो समितियों का गठन किया गया था उन पर भी लेखक धर ने आरोप लगया है | 1956 में बनी शाह नवाज़ की समिति और 1970 में बनी जस्टिस जी डी खोसला कमीशन की समिति पर, अपनी किताब के मद्दयम से यह आरोप लगाया है की इन सभी समितियों ने और जितने भी गवाह, सुभाष जी की मौत के रहे है ज्यादातर वो सभी कांग्रेस की पार्टी से रहे है यही कर्ण है की इन सभी समितियों की रिपोर्ट कोंग्रेस से काफी प्रभावित रही है | इसी कारण इन सभी रिपोर्टो में कोई सच्चाई नहीं दिखाई गयी है | इन सभी समितियों के बाद भाजपा की भारत में जब सरकार आई तो वाजपेयी जी की सत्ता में एक बार फिर से एक समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष थे जस्टिस एम के मुखर्जी | बाजपेयी जी तो पांच साल बाद चले गए लेकिन जस्टिस मुखर्जी ने अपनी कारवाही जरी रखी | यूपीए के दुबारा सत्ता में आने पर प्रणव मुखर्जी डिफेंस मिनिस्टर बने और नेताजी के उन सात गवाहों में से एक होने के कारण उन्होंने हवाई हमले की बात जस्टिस मिखार्जी को बताई | लेखक धर ने आगे प्रणव दादा पर इस बात का भी आरोप लगाया है की 1995 में प्रणव मुखर्जी जापान गये थे वहा के फोरेन मिनिस्टर से मिलने जिसके बाद वो वही जापान में रहने वाली नेता जी की धर्मपत्नी से भी मिलने गए थे और तब उन्होंने मुखर्जी से मिलने को मन कर दिया था और ये भी कहा था की आप यहाँ दोबारा कभी न आयें |

इन सभी खुलासों से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का परिवार अभी तक सकते में है | उनके वंशज चंद्रकुमार बोस का कहना है की “ जासूसी उन लोगो की होती है, जो अपराधी होते है | या जिनका आतंकवादियों से वासता होता है | सुभाष बाबू और उनके परिजन भारत की आज़ादी से लड़े थे फिर उनकी जस्सोसी क्यों की गयी ?” हलाकि अख़बार में दिए एक इंटरव्यू में नेता जी की बेटी अनीता (73) का कहना है की “ हमारे परिवार की जासूसी की बात से मैं हेरान नहीं हूँ | जब में तीन साल की थी तब हमारे विईना के फ्लैट में एक भारतीय अधिकारी, ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग के अफसरों के साथ आये थे | माँ से कुछ सवाल किये थे | तब मेरी माँ ने उनसे देश के गद्धारों की बात कही थी जिसे सुनके उस अफसर का चेहरा लाल हो गया था |

तो क्या सुभाष जी बन सकते थे नेहरु से बड़े नेता?

नेता जी सुभाष चन्द्र बॉस के निधन के बाद 1948 से 1968 तक उनके घरवालों की जासूसी कराइ गयी थी | इस दौरान लगभग दो दशक 16 सालों तक पंडित जवाहरलाल नेहरु आज़ाद देश के प्रधानमंत्री बने रहे | आईबी के प्रमुख सीधे उन्हें ही रिपोर्ट करते रहे | इन सभी बातों से ये समझा जा सकता है की नेता जी की मौत से सम्बंधित साड़ी जानकारियां सीधे-सीधे नेहरु जी को ही मिलती रही | इन सभी खुलासों ने देश के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल लाकर खड़े कर दिए है | आखिर कैसे हुई सुभाष जी की मौत? क्यों नेता जी की मौत के बाद भी उनके परिवार वालों की जासूसी होती रही? और और अगर ये साड़ी बाते सच है तो पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने क्यों नहीं किया कोई कारवाही?