पुराना मोहल्ला, नए कलेवर में
इलाहाबाद, जिसके नाम का मतलब ही “आल्लाह का आबाद किया” हो उससे भला कौन नहीं जानना
चाहेगा| यूँ तो ये शहर अपने आप में ही
एक दिलचस्ब इतिहास समेटे हुए है परन्तु इस शहर में आज भी कुछ ऐसे मुहल्ले है जिनका
इतिहास बेहद रूमानियत भरा है | उन्ही में से एक है...शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइंस | इलाहाबाद की जान कहे जाने वाला ये इलाका शहर के मध्य में बसा है | बात करे यदि यहाँ के इतिहास की तो ब्रिटिश के ज़माने से ही रहीसों का इलाका रहा
है | यंहा किसी भी साधारण
हिन्दुस्तानी का जाना लगभग मुश्किल सा था | समय बीता, देश ने अपनी
आज़ादी की हवा में सांस लेना शुरू कर दिया और इसी के साथ इलाहाबाद के इस इलाके में
भी बदलाव आना शुरू हो गया | लेकिन इस इलाके
में वही शानो-शौकत दिखती है जो कभी अंग्रेजो के ज़माने में हुआ करती थी..आज भले ही
समय के साथ लोगो ने खुद को बदल लिया हो मगर इलाके की शान आज भी उसी अंदाज़ में
बरक़रार है | अंग्रेजों के आने से पहले
इलाहाबाद का स्वरुप कुछ अलग ही था| दक्षिण में जहांगीर द्वारा बसाया गया मोहल्ला खुल्दाबाद, पूर्व में झूंसी और अन्य कुछ मोहल्ले थे| 19वीं शताब्दी के मध्य में जब अंग्रेज़ी सेना प्रयाग में आई तब से प्रयाग का रंग
रूप ही बदलने लगा| कई ऐसे मोहल्ले
बसाए गए जो सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही थे| अब ज़रूरत थी ऐसे मोहल्ले की जहाँ अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ समय बिताने के
लिए निकल सके| ब्रिटेन की तर्ज़
पर यहाँ पर भी उसी तरह के मोहल्लों को बसाने की योजना शुरू हुई|
सन् 1857 में ग़दर के पश्चात्, ‘कडबर्ट बेन्स्ले
थोर्न्हिल’ की मेहनत से
सिविल लाइन्स को बसाया गया| ये शहर का सबसे
प्रतिष्ठित इलाका हुआ करता था| शहर का दिल कहा जाने वाला सिविल लाइन्स पहले सिर्फ अंग्रेजों के लिए ही बना था| यहाँ किसी भी भारतीय को जाने की अनुमति नहीं थी| कहा जाता है की शाम के वक़्त अंग्रेज़ अपने परिवार के साथ घूमने निकलते थे| भारत के दूसरे कई शहरों में सिविल लाइन्स देखने को मिलता है|
सिविल लाइन्स स्थित ‘अल्फ्रेड पार्क’ भी अपने में इस
इलाके की शान है| ये पार्क ‘कंपनी बाग’ के नाम से जाना
जाता है क्यूंकी पहले यहाँ अंग्रेज़ पलटन रुका करती थी| यहाँ पर पहले मेवातियों के आठ गाँव थे जिनमें छीतपुर और सम्दाबाद नाम के भी
गाँव शामिल थे| इन गाँवों को
उजाड़ कर यहाँ पर कम्पनी बाग बनवाया गया था| इसी कंपनी बाग में ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ को अंग्रेज सैनिकों ने गोली मारी थी| अब इस बाग का नाम ‘चंद्रशेखर आज़ाद पार्क’ रख दिया गया है|
यूँ तो किसी भी शहर का मिजाज़ जानने के लिए उसके
इतिहास का ज्ञान बेहद आवश्यक है मगर इस बात में कोई दो राय नहीं की इस इलाके की
पहचान यंहा के खानों से भी है | बात चाहे यहाँ के बड़े होटलों में मिलने वाला बेहतरीन मलाई कोफ्ता हो या सिविल
लाईन्स की सडको पे मिलने वाला चिकन कबाब, यंहा का ज़ायका आपको मजबूर कर देगा इसका स्वाद चखने के लिए | सिर्फ यही नहीं जैसे-जैसे समय करवट ले रहा है वैसे-वैसे इस इलाके की “मिठास” भी बढती जा रही
है | सिर्फ लोगो के खान-पान में ही
नहीं बल्कि इस इलाके के लोगो के स्वभाव में भी चाशनी सी घुलती हुई प्रतीत होती है | इस इलाके की सबसे खास बात ये है की यंहा किसी भी ज़बान को सुकून दिलाने वाला
स्वाद मौजूद है फिर चाहे वो शाकाहारी हो या मांसाहारी |
सिविल लाइंस न सिर्फ अपने इतिहास बल्कि अपने स्वाद के लिए भी काफी मशहूर है | यंहा ठेले पे मिलने वाली चाट हो या पिछले दो दशकों से प्रसिद्ध “खोखा राय का दही बड़ा”, आज भी लोगो को
अपनी ओर उसी लाजवाब खुशबू से आकर्षित करता है | खोखा राय के इस दही भल्ले ने पूरे शहर में अपना ऐसा चटपटा स्वाद छोड़ा है की
पूरे शहर की आबादी में कुछ ही ऐसे होंगे जिन्होंने इस लज़ीज़ भल्लो को ना चखा हो | उड़द के दाल से बने ये नमकीन भल्ले, जिनमे मेवों का भी भरपूर इस्तेमाल होता है, जब दही के साथ मिलते है तो पूरे मुंह का स्वाद लाजवाब हो जाता है | इन दही भल्लो में कुछ ऐसा जादू सा है की सिर्फ एक से किसी का मन नहीं
भरता...मजबूरन आपको एक और प्लेट लेनी ही पड़ती है | और यकीन मानिये अगर आपने इस दही-भल्ले को एक बार खाया तो जिंदगी भर उसके स्वाद
की मिठास आपके ज़बान पे रहेगी |
बात करे यदि सिविल लाईन्स के स्वाद की इतिहास की, तो सबसे पहले जुबान पर जो नाम आता है वो है इस इलाकें की सबसे पुरानी मिठाई की
दुकान “कामधेनू” | यहाँ बनने वाली सभी मिठाइयों का ज़ायका सिर्फ देशी ही नही, विदेशी भी पूरी तरीके से उठाते है | यहाँ की बनी मिठाइयो में सबसे मशहूर है काजू की कतली |
शहर के सबसे पुराने सिनेमा हॉल के ठीक बगल में बनी ये
दुकान लोगो के जीभ को आज भी संतुष्ट कर रहा है | मिठाई के बाद यदि सबसे प्रसिद्ध कोई पेय व्यंजन इस इलाके का है तो वो है
इलाहाबाद का सबसे पुराना और सबसे नामचीन “कौफ़ी हाउस” | ये इमारत न सिर्फ
अपनी लज़ीज़ कौफ़ी के लिए जाना जाता है बल्कि इसी इमारत की छत के नीचे बैठकर देश और
दुनिया की तमाम बाते, फिर चाहे वो
राजनीती से जुडी हो या सामाजिक, उन सभी का निवारण इस इमारत के नीचे चाय और कौफ़ी की चुस्कियों के साथ निकला
जाता है |
सिविल लाइंस भले ही अतीत के पन्नो के बीच खड़ा हो लेकिन
इस इलाके ने खुद को समय के बदलते दौर के साथ बड़ी तेज़ी से बदल लिया है | एक समय में यह इलाका खाने की दृष्टि से सिर्फ पारम्परिक ही माना जाता था | अर्थात पहले यंहा सिर्फ परम्परागत खाना ही मिलता था लेकिन जैसे-जैसे समय बदला
लोगो की मांग बढ़ी वैसे-वैसे इस इलाके ने भी खुद को बदला और परम्परागत खानों से हट
कर कुछ नया और पश्चिमी सभ्यता वाले व्यंजन को अपने थाली में परोसा | ये सभी व्यंजन आज न सिर्फ लोगो को भाह रहे है बल्कि आज इस शहर में काम करने
वाले लगभग पचास प्रतिशत नौजवान इन्ही व्यंजनों के सहारे अपना दिन गुज़रते है | इन पश्चिमी व्यंजनों में सबसे पहला और सबसे मशहूर है ‘बर्गर’ | इसी के चलते
विदेशो की कंपनियों ने अपनी फ़्रेनचाईज़ी इलाहाबाद शहर के सिविल लाइंस इलाके में
खोला | जो आज सारे जिसका नाम आज सभी के
ज़बान में रहता है “मैक-डोनल्ड” | इसी के साथ शुरू हुआ इस आधुनिकीकरण का भोजन आज लोगो के बीच काफी मशहूर है | बर्गर के साथ ही पिज़्ज़ा की दीवानगी, की एक लहर इस शहर में ऐसी चली जिससे कोई अछूता नहीं रह पाया, फिर चाहे वो बच्चा हो या नौजवान | महिला हो या बुज़ुर्ग, आज सभी की ज़बान
पे “डोमिनोज”, और “पिज़्ज़ा हट” की रट लगी रहती है |
इन सभी के अलावा फ्रेंच और चाइनीज़ व्यंजनों का भी एक
दौर सा शुरू हो गया | जहा लोग सिविल
लाइंस के मशहूर रेस्तरा ”शहंशाह” की चाऊमीन के दीवाने हो गये वही होटल “कान्हा श्याम” में मिलने वाला ‘मोमोज़’ का नाम सुनते ही
लोगो के मुंह में पानी आने लगा | सिर्फ यही नहीं वर्तमान समय ने एक बार फिर करवट ली है और इन सभी के अलावा पुरे
शहर में एक बार फिर से एक नए दौर ने जन्म लिया है | आज के लोगो के बीच अब सिर्फ पिज़्ज़ा, बर्गर के अलावा नॉन-वेज का शौक भी देखा जा सकता है |
ऐसा बिलकुल नहीं है की प्राचीन समय में लोग मांस खाया ही नहीं करते थे..परन्तु आज की तुलना में उस वक़्त मांसाहारियों की संक्या काफी कम हुआ करती थी | लोगो की ही बढती डिमांड को देखते हुए इस इलाके ने भी आपने आप को बदला और परम्परागत और पश्चिमी खाने के साथ ही लोगो ने मांस से बने व्यंजनों को भी तवज्जों दिया | इसी प्रक्रिया को और आगे बढ़ाने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चिकेन की फ़्रेनचाईज़ी ”के.एफ.सी.” ने इस शहर में अपनी जड़े मज़बूत करनी शुरू कर दी | और आज आलम ये है की दिन हो या शाम इस इमारत में आपको हर समय भीड़ ही दिखाई देगी | इसी के साथ ही पिछले कुछ सालों से एक और बहुत ही फेमस स्ट्रीट शॉप जो लोगो की ज़बान पे रहती है, और जहाँ की चिकेन बिरयानी पुरे शहर में बेहद मशहूर है उसका नाम है ”इट-ऑन” | यहाँ की बिरयानी के बारे में तो लोग कुछ यु कहते है की अगर आपने इट-ऑन की बिरयानी नहीं खायी तो आपने कुछ नहीं खाया | और वाकई में इस बिरयानी का स्वाद एक दम अलग और जायकों से भरा है |












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