Saturday, 16 April 2016

आलसी के साथ विरोधियों का शहर भी घोषित होना चाहिए इलाहाबाद

सात बजे के अलार्म और सुबह की एक कप चाय। दही-जलेबी के साथ अंगाड़ाई और भर पेट पराठे के साथ सुबह का नश्ता। खाने के शौकीन इस शहर को हमेशा से ही आलसी शहर का टैग मिलता रहा है। कभी काम के मामले में तो कभी घूमने के मामले में। प्रयाग के वासी हमेशा से ही एक ढर्रे पर चलने के आदि हो चुके हैं।
सुबह सात बजे उठकर मौज से नाश्ता, छह घंटे ऑफिस के बाद घर और फिर रात नौ बजे तक बिस्तर। ऐसे में शहर में हो रही कई नई और अच्छी चीजों की शुरूआत को भी हम अपने रवैये से खराब होने का दर्जा दे डालते हैं। जिसे गहराई से सोचकर देखें तो शहर आलसी होने के साथ एक विरोधाभास प्रकृति का भी होता जा रहा है।
शहर के सुन्दरीकरण के लिए शहर में जगह-जगह नए काम हो रहे हैं। जहां बजट में तीन फ्लाईओवरों की सौगात मिली है तो वहीं शहरों के पर्यटन स्थलों और पार्कों को सुंदर बनाया जा रहा है। इन सभी के बीच आजाद पार्क में लगने वाले टिकट शुल्क को लेकर शहर में सबसे ज्यादा गहमा-गहमी है। टिकट की प्रक्रिया वापिस लो और टिकट नहीं लगना चाहिए के साथ आजाद को बांध दिया जा


एगा जैसे वाक्यों के साथ शहर का एक हिस्सा आवाज उठा रहा है। सोचने वाली बात यह है कि बड़े होटलों में खाना खाने के बाद पांच रुपये टिप्स देना हो या गंगा-यमुना पुल क्रॉस करते समय नदी में मन्नत मांगते हुए पैसे फेंकना हो। इन सभी चीजों में शहर का एक भी सदस्य आवाज नहीं उठाता लेकिन शहर की सफाई और पार्कों को सुन्दर बनाएं अथवा उसके मेनटेनेन्स के लिए लिए जाने वाले शुल्क पर सबको नामंजूरगी है।
कभी धरना तो कभी बैठक शुल्क हटाने के लिए शहर के लोगों ने अजीबो-गरीब तरीके की दलीलें देने भी शुरू किए हैं। इन सभी घटनाओं को देखकर प्रयाग सिर्फ आलसी ही नहीं बल्कि विरोधियों का शहर भी समझ में आने लगा है।

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