Sunday, 29 December 2013

बचपन कि यादें.........


 
                                              चंपक,बालहंस,पराग,चाचा चौधरी,नागराज,पिंकी.......याद आया कुछ!!!!!??? जी हाँ हमारे समय कि कुछ ऐसी कौमिक्स जिसके लिए हमारे बीच होड़ सी मची रहती थी| छुट्टियों में दिन भर खेलने के बाद सिर्फ इनको पढना ही हमारा कम हुआ करता था| हम अपनी साडी जमापूंजी इन कौमिक्स में ऐसे उड़ाया करते थे कि बस पूछों ही मत.....मम्मी कि वो डांट,पापा कि फटकार क्या-क्या नहीं झेला था सिर्फ उस एक कौमिक्स के लिए| चाचा चौधरी तो शायद हमारी जान हुआ करते थे,उनकी सूझ-बूझ और होशियारों को पढकरही हम आज शायद इतने अक्क्ल्मंद हुए है| बालहंस कि वो सभी जानकारियां,आज भी ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर हमारा साथ देती है| चंपक की वो सभी कहनियाँ और किस्से आज भी दिमाग में चिपके हुए है,तभी तो आज भी हम अपनी बात सिद्ध करने के लिए उन्ही कहानियों और किस्सों का उदहारण लेते है|

                                  हर साल दिवाली से पहले जब घर का सारा कबाड़, कबाड़ वाला ले जाता था तो हम अपनी इन कौमिक्स को किसी आलमारी या कपडें से ढककर छुपा देते थे कि कहीं इन्हें भी रद्दी समझकर कबाड़ में न डाल दिया जाये| गलियों में,दोस्तों के घरों में,सिर्फ एक बात पर ही चर्चा होती थी कि किसने कोण सी नयी कौमिक्स पढ़ी??? फिर उस नयी कौमिक्स को आपस में बाँटने में भी झगड़ें होते थे| ओहो ये कौमिक्स कि दीवानगी आज के समय में तो ये कंही गम सी हो गयी है....आज कल  न तो इन्हें जल्दी कोई खरीदता है और न ही पड़नेवाले वाले ही ज्यादा बचे है|आज कल बच्चों के कन्धों पर कोम्पटीशन इतना ज्यादा दल दिया गया है कि उन्हें अपने 5-8किलो के किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती| जो थोड़ी भुत कसर बचती है तो उसमे कुछ तो hoby class में और कुछ computer games में निकल जाती है| घरों में डिसकशन, computer games पे होता है|इस कोम्पटीशन कि दुनिया में अपने बच्चों को आगे, बहुत आगे निकलने कि कोशिश में माँ-बाप ने बच्चों को उस सच्चाई से रूबरू नहीं कराया है जो देखने में तो सिर्फ मनोरंजन जैसी ही है लेकिन असल ज़िन्दगी में इसके फायदे शायद बड़े होने पर ही समझ आते है|  

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